Thanks for joining me!
Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

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179 : आइशा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नापाकी का गुस्ल फरमाते तो पहले दोनों हाथ धोते, फिर नमाज के वुजू की तरह वुजू करते,उसके बाद अपनी उंगलियाँ पानी में डालकर बालों की जड़ों का खिलाल करते, फिर दोनों हाथों से तीन चुल्लू पानी लेकर अपने सर पर डालते, उसके बाद अपने तमाम जिस्म पर पानी बहाते।
फायदे : गुस्ल में बदन पर पानी बहाने से फर्ज अदा हो जाता है, लेकिन सुन्नत तरीका यह है कि पहले वुजू किया जाये।
180 : मैमूना रजि से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (गुस्ल के वक्त) पहले नमाज के वुजू की तरह वुजू किया, लेकिन पांव नहीं धोये, अलबत्ता अपनी शर्मगाह और जिस्म पर लगने वाली गन्दगी को धोया, फिर अपने ऊपर पानी बहाया, उसके बाद गुस्ल की जगह से अलग होकर अपने दोनों पांव धोये आपका नापाकी का गुस्ल यही था।
फायदे : गुस्ल के लिए जरूरी है कि पहले पर्दे का इन्तिजाम करे, फिर दोनों हाथ धोये जायें, उसके बाद दायें हाथ से पानी डालकर शर्मगाह को धोया जाये और उस पर लगी हुई गन्दगी को दूर किया जाये। फिर वुजू का अहतमाम हो, लेकिन पांव ना धोये जायें। फिर बालों की जड़ों तक पानी पहुंचाकर उन्हें अच्छी तरह तर किया जाये, फिर तमाम बदन पर पानी बहाया जाये। आखिर में गुस्ल की जगह से अलग होकर पांव धोये जायें।
181: आइशा रजि. से रिवायत है। उन्होनें फरमाया कि मैं और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (दोनों मिलकर) एक बर्तन से गुस्ल करते थे,एक बड़ा प्याला, जिसे फरक कहा जाता था।
182 : आइशा रजि. से ही रिवायत है कि उनसे जब नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम की नापाकी के गुस्ल की हालत पूछी गयी तो उन्होंने एक सा के बराबर पानी का बर्तन मंगवाया, उससे गुस्ल किया और अपने सर पर पानी बहाया, गुस्ल के बीच हजरत आइशा रजि. और सवाल करने वाले के बीच पर्दा लगा था।
फायदे : अगर आदमी ज्यादा खर्च न करे तो एक साअ पानी से बखूबी गुस्ल हो सकता है। इस हदीस पर हदीस का इनकार करने वाले बहुत ऐतराज करते हैं कि इसमें लोगों के सामने गुस्ल करने का बयान है। लिहाजा हदीसों की सच्चाई बेकार है। हालांकि गुस्ल में पर्दा किया गया है और जिनके सामने आपने गुस्ल किया, वो आपके मोहरिम थे क्योंकि एक तो रजाई भांजा और दूसरा रजाई भाई था।
183 : जाबिर बिन अब्दुल्लाह रजि. से रिवायत है कि उनसे किसी आदमी ने गुस्ल के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि तुझे एक साअ पानी काफी है। एक दूसरा आदमी बोला, मुझे तो काफी नहीं है। जाबिर रजि. ने फरमाया कि यह मिकदार उस आदमी को काफी हो जाती थी, जिसके बाल भी तुझ से ज्यादा थे। और वो खुद भी तुझसे बेहतर था, यानी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम। फिर जाबिर रजि. ने एक कपड़े में हमारी इमामत कराई।
फायदे : मालूम हुआ कि हदीस के खिलाफ झगड़ने वाले को सख्ती से समझाने में कोई हर्ज नहीं, जैसा कि हजरत जाबर रजि. ने हसन बिन मुहम्मद विन हनफिया को समझाया।
184 : जुबैर बिन मुत्इम रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ‘फरमाया मैं तो अपने सर पर तीन बार पानी बहाता हूँ, यह कह कर आपने अपने दोनों हाथों से इशारा फरमाया।
185 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्हों ने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नापाकी का गुस्ल करने का इरादा ‘फरमाते तो कोई चीज हिलाब जैसी मंगवाते और उसे अपने हाथ में लेकर पहले सर के दायें हिस्से से शुरू करते, फिर बायें तरफ (लगाते थे) उसके बाद अपने दोनों हाथों से तालू पर मालिश करते।
186 : आइशा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खुश्बू लगाया करती थी, बाद में आप अपनी सब बीवियों के पास दौरा फरमाते फिर दूसरे दिन एहराम बांधते, इसके बा-वुजूद आपके जिस्म मुबारक से खुशबू की महक निकल रही होती थी।
फायदे : मुस्लिम में है कि जब आदमी हम बिस्तर होने के बाद दोबारा बीवी के पास जाये तो वुजू कर ले, लेकिन वुजू करने का हुक्म वाजिब और फर्ज नहीं है।
187 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम अपनी बीवियों का रात दिन की एक घड़ी में दौरा कर लेते बावजूद यह कि आपकी ग्यारह बीवियाँ थी। एक दूसरी ‘रिवायत में नौ औरतों का जिक्र है। अनस रजि. से पूछा गया, क्या आप में इस कद्र त्ताकत थी? उन्होंने जवाब दिया, हम तो कहा करते थे आपको तीस मर्दों की ताकत मिली है।
फायदे : ग्यारह से मुराद नौ बीवियाँ और दो आपकी कनीज हैं। एक का नाम मारिया और दूसरी का रेहाना था।
188 : आइशा रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमायाः गोया मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मांग में खुशबू की चमक को देख रही हूँ, जब आप एहराम बांध रहे होते।
फायदे : बाब से लगाव इस तरह है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने एहराम का गुस्ल किया था। मालूम हुआ कि पहले खुशबू लगाई फिर गुस्ल फरमाया।
189 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम जब नापाकी का गुस्ल फरमाते तो पहले अपने दोनों हाथ धोते और नमाज के वुजू जैसा वुजू फरमाते, फिर अपने दोनों हाथों से बालों का खिलाल करते, जब आप समझ लेते कि खाल तर हो चुकी है तो उस पर तीन बार पानी बहाते, फिर अपना बाकी जिस्म घोते।
190: अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि एक बार नमाज के लिए तकबीर कही गई, जब सफें बराबर हो गयीं तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ लाये, मुसल्ले पर खड़े होते ही आपको याद आया कि मैं नापाकी से हूँ। चूनांचे ही आपने हम से फरमाया, अपनी जगह पर रहो, फिर आप लौट गये और जल्दी से गुस्ल कर के वापिस तशरीफ लाये और आपके सर मुबारक से पानी टपक रहा था। आपने (नमाज) के लिए अल्लाहु अकबर कहा, और हम सब ने आपके साथ नमाज अदा की।
फायदे : इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि अगर नापाकी के गुस्ल में देर हो जाये तो कोई हर्ज नहीं है। नीज यह भी मालूम हुआ कि अजान या तकबीर के बाद किसी सही बहाने की बिना पर मस्जिद से निकलने में कोई हर्ज नहीं।
191 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: बनी इस्राइल एक दूसरे के सामने नंगे नहाया करते थे जबकि मूसा अलैहि. अकेले नहाते। बनी इस्राइल ने कहा, अल्लाह की कसम! मूसा अलैहि. हमारे साथ इसलिए गुस्ल नहीं करते कि आप किसी बीमारी में मुब्तला हैं, इत्तिफाक से एक दिन मूसा अलैहि. ने नहाते वक्त अपना लिबास एक पत्थर पर रख दिया। हुआ यूँ कि वह पत्थर उनका कपड़ा ले भागा, मूसा अलैहि. उसके पीछे यह कहते हुये दौड़े, ऐ पत्थर! मेरे कपड़े दे दे, ऐ पत्थर! मेरे कपड़े दे दे, यहां तक कि बनी इस्राईल ने हजरत मूसा अलैहि. को देख लिया और कहने लगे, अल्लाह की कसम मूसा अलैहि. को कोई बीमारी नहीं, मूसा अलैहि. ने अपने कपड़े लिये और पत्थर को मारने लगे। हजरत अबू हुरैरा रजि. ने फरमाया, अल्लाह की कसम! मूसा अलैहि. की मार के छः या सात निशान उस पत्थर पर अब भी मौजूद हैं।
फायदे : बनी इस्राईल का खयाल था कि हजरत मूसा अलैहि. के खुसिये (गुप्तांग) बढ़े हुए हैं इसलिए शर्म के मारे हमारे साथ नहीं नहाते, कहीं ऐब जाहिर न हो जाये। इस हदीस से मालूम हुआ कि किसी जरूरत के पेश नजर दूसरों के सामने सतर खोलना जाइज है।
192 : अबू हुरैरा रजि. से ही यह दूसरी रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, एक बार अय्यूब अलैहि. नंगे नहा रहे थे कि उन पर सोने की मकड़ियाँ बरसने लगीं। अय्यूब अलैहि. उन्हें अपने कपड़े में समेटने लगे। इस मौके पर अल्लाह तआला ने आवाज दी, ऐ अय्युब! जो तुम देख रहे हो कया मैंने तुम्हें उनसे बे-नियाज नहीं किया। अय्युव अलैहि. ने कहा! मुझे तेरी इज्जत की कसम! क्यों नहीं, मगर मैं तेरे करम से बे नियाज नहीं हो सकता हूँ।
फायदे : इस हदीस से अल्लाह तआला के बात करने की खूबी भी साबित होती हैनीज यह भी मालूम हुआ कि इस खूबी में आवाज भी है।
193 : उममे हानी बिन्ते अबू तालिब रजि. से रिवायत है, उन्होंने ‘फरमाया कि मैं फतहे मक्का के साल रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के पास गयी तो मैंने आपको गुस्ल करते हुये पाया और फातिमा रजि. आप पर पर्दा किये हुये थीं, आपने फरमाया यह कौन है? मैंने अर्ज किया जनाब मैं हूँ उम्मे हानी रजि. |
194 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम उन्हें मदीना के किसी रास्ते में मिले और खुद अबू हुरैरा रजि. नापाकी से थे, वो कहते हैं कि मैं आपसे अलग हो गया, जब गुस्ल करके वापस आया तो आपने पूछा, अबू हुरैरा रजि.! तुम कहाँ चले गये थे, अबू हुरैरा रजि. ने अर्ज किया कि मुझे नहाने की जरूरत थी तो मैंने पाकी के बगैर आपके पास बैठना बुरा खयाल किया, आपने फरमाया, सुब्हान अल्लाह! मोमिन किसी हाल में नापाक नहीं होता।
फायदे : इस हदीस से पसीने के पाक होने का सुबूत मिलता है कि जब बदन पाक है तो जो बदन से निकले, उसे भी पाक होना चाहिए। याद रहे कि नापाक की गन्दगी हुक्मी है और काफिर की एतकादी। जब तक बदन पर कोई हकीकी गन्दगी न हो, नापाक नहीं होता।
195 : उमर बिन खत्ताव रजि. से रिवायत है, उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि क्या हम में से कोई नापाकी की हालत में सो सकता हैं? आपने फरमाया, “’हाँ” जब तुममें कोई नापाकी की हालत में हो तो वुजू कर ले और सो जाये।
फायदे : दूसरी हदीस में है कि वह पहले शर्मगाह से गन्दगी को धो ले फिर नमाज के वुजू की तरह वुजू करे, लेकिन इस वुज़ू से नमाज नहीं पढ़ सकता, क्योंकि नाशाकी की हालत मैं’ नहाये बगैर नमाज अदा करने की इजाजत नहीं।
196 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जब मर्द (अपनी) औरत के चारों हिस्सों के बीच बैठ गया, फिर उसके साथ कोशिश की यानी दुखूल किया तो यकीनन गुस्ल जरूरी हो गया।
फायदे : बाज हजरात ने यह बात इख्तियार की है कि सिर्फ दुखूल से गुस्ल वाजिब नहीं होता, जब तक मनी ना निकले। शायद उयह हदीस न पहुंची हो ।
197 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि हम सब मदीना से सिर्फ हज के इरादे से निकले और जब मकामे सरिफ पर पहुंचे तो मुझे हैज आ गया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे पास तशरीफ लाये तो मैं रो रही थी, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, तुम्हारा क्या हाल है? क्या तुम्हे हैज आ गया हैं? मैंने अर्ज किया जी हाँ! आपने फरमाया कि यह मामला तो अल्लाह तआला ने हजरत आदम अलैहि. की
बेटियों पर लिख दिया है। इसलिए हाजियों के सब काम करती रहो,अलबत्ता काबा का तवाफ ना करना। आइशा रजि. ने फरमाया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी बीवियों की तरफ से एक गाय की कुरबानी दी।
फायदे : मालूम हुआ कि हैज वाली औरत बैतुल्लाह के चक्कर के अलावा दीगर हज के अरकान अदा करने की पाबन्द है।
198 : आइशा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं हैज की हालत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर मुबारक में कंघी किया करती थी।
फायदे : मालूम हुआ कि हैज वाली औरत घर का काम काज और शौहर की दूसरी तमाम खिदमते अंजाम दे सकती है।
199 : आइशा रजि. से ही एक दूसरी रिवायत में यूँ है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिद में तशरीफ फरमा होते और अपना सर मुबारक उनके करीब कर देते और वह खुद हैज की हालत में अपने कमरे में रहते हुये उन्हें कघी कर दिया करती थी।
200 : आइशा रजि. से ही रिवायत है, उन्होने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरी गोद में तकिया लगा लेते थे। जबकि मैं हैज से होती, फिर आप कुरआन मजीद तिलावत फरमाते थे।
फायदे : हैज वाली औरत और नापाक आदमी कुरआन मजीद को हाथ नहीं लगा सकता, अलबत्ता उसकी गोद में तकिया लगाकर कुरआन पढ़ना दूसरी बात है।
201 : उम्मे सलमा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि एक बार मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक ही चादर में लेटी हुई थी कि अचानक मुझे हैज आ गया, मैं आहिस्ता से सरक गयी और अपने हैज के कपड़े पहन लिये तो आपने फरमाया, क्या तुम्हें निफास आ गया है। मैंने अर्ज किया, जी हाँ! फिर आपने मुझे बुलाया और मैं उसी चादर में आपके साथ लेट गयी।
202 : आइशा रजि. से रिवायत है,फरमाती हैं कि मैं और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दोनों नापाकी की हालत में एक बर्तन से गुस्ल किया करते, इसी तरह मैं हैज से होती और आप हुक्म देते तो मैं इजार पहन लेती, फिर आप मेरे साथ लेट जाते। नीज आप एतकाफ की हालत में अपना सर मुबारक मेरी तरफ कर देते तो मैं उसको धो देती, जबकि मैं खुद हैज से होती।
203 : आइशा रजि. से दूसरी रिवायत में है, फरमाती हैं, हममें से जब किसी औरत को हैज आता और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उससे मिलना चाहते तो उसे हुक्म देते कि अपने हैज की ज्यादती के वक्त इजार पहन ले, फिर उसके साथ लेट जाते। उसके बाद आइशा रजि. ने फरमाया, तुम में से कौन है, जो अपनी ख्वाहिश पर इस कदर काबू रखता है जिस कदर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी ख्वाहिश पर काबू रखते थे।
फायदे : मालूम हुआ कि जिसका अपने जोश पर कट्रोल न हो वह ऐसे मिलने से परहेज करे, कि कहीं हराम काम न हो जाये।
204 : अबू सईद खुदरी रजि, से रिवायत है उन्होंने बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ईदुल अजहा या ईदुल फित्तर में निकले और ईदगाह में औरतों की जमाअत पर गुजरे तो आपने फरमाया, औरतों! खैरात करो, क्योंकि मैंने तुम्हें ज्यादातर दोजखी देखा है। वह बोली, ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क्यों? आपने फरमाया, तुम लानत बहुत करती हो और शौहर की नाशुक्री करती हो। मैंने तुमसे ज्यादा किसी को दीन और अक्ल में कमी रखने के बावजूद पुख्ता राये मर्द की अक्ल को पछाड़ने वाला नहीं पाया। उन्होंने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! हमारी अक्ल और दीन में कया नुकसान है? आपने ‘फरमाया: क्या औरत की गवाही शरीअत के मुताबिक मर्द की आधी गवाही के बराबर नहीं? उन्होंने कहा, बेशक है। आपने फरमाया, यही उसकी अक्ल का नुकसान है। फिर आपने फरमाया, क्या यह बात सही नहीं कि जब औरत को हैज आता है तो न नमाज पढ़ती है और ना रोजा रखती है। उन्होंने कहा, हाँ! यह तो है। आपने फरमाया, बस यही उसके दीन का नुकसान है।
205 : आइशा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ आपकी एक बीवी ने एतेकाफ किया। जबकि उसे इस्तिहाजा (खून) की बीमारी थी वह अकसर खून देखती रहती और आम तौर पर वह अपने नीचे खून की वजह से परात (तश्त) रख लिया करती थीं।
फायदे : जिस आदमी को हर वक्त हवा निकलने की बीमारी हो या जिसके जख्मों से खून बहता रहे, उसका भी यही हुक्म है।
206 : उम्मे अतिय्या रजि, से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि हमें किसी भी मरने वाले पर तीन दिन से ज्यादा गम करने की मनाही की जाती थी। मगर शौहर (के मरने) पर चार महीने दस दिन तक (गम का हुक्म था)। नीज यह भी हुक्म था कि इस दौरान न हम सूरमा लगायें, न खुशबू और न ही कोई रंगीन कपड़ा पहने। मगर जिस कपडे का धागा बनावट से रंगा हुआ हो, अलबत्ता हैज से पाक होते वक्त यह इजाजत थी कि जब हैज का गुस्ल करे तो थोड़ी सी खुशबू इस्तेमाल कर ले इसके अलावा जनाजों के साथ जाने की भी मनाही कर दी गयी थी।
फायदे : हमारे हिन्द और पाक में ज्यादातर औरतें इस नबी के हुक्म को नजर अन्दाज कर देती हैं। हैज से फरागत के बाद घिनन और नफरत को दूर करने के लिए खुशबू को जरूर इस्तेमाल करना चाहिए।
207 : आइशा रजि. से बयान है एक औरत ने नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम से अपने गुस्ले हैज के बारे में पूछा? आपने उस के सामने गुस्ल की कैफियत बयान की (और) ‘फरमाया कि कस्तूरी लगा हुआ रूई का एक टुकड़ा लेकर उससे पाकी कर, वह कहने लगी, कैसे पाकी करूँ? आपने फरमाया, सुब्हान अल्लाह! पाकिजगी हासिल कर आइशा रजि. फरमाती हैं कि मैंने उस औरत को अपनी तरफ खींचा और उसे समझाया कि खून की जगह यानी शर्मगाह पर लगा ले।
फायदे : सही मुस्लिम में है कि औरत को अपने सर पर पानी डालकर खूब मलना चाहिए, ताकि पानी बालों की जड़ों तक पहुंच जाये। फिर अपने तमाम बदन पर पानी बहाये।
208 : आइशा रजि. से ही रिवायत है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ आपके आखरी हज में एहराम बांधा तो मैं उन लोगों में शामिल थी, जिन्होंने तमत्तो के हज की नियत की थी।और अपने साथ कुरबानी नहीं लाये
थे (इत्तेफाक से) मुझे हैज आ गया, और अरफा की रात तक पाक ना हुई। तब मैंने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! यह तो अरफा की रात आ गयी और मैंने तो उमरे का एहराम बांधा था (अब क्या करूं?) । रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, तुम अपना सर खोलकर कंघी करो और अपने उमरे के आमाल को खत्म कर दो। चूनांचे मैंने ऐसा ही किया और जब मैं हज से फारिग हो गयी तो आपने महसब की रात (मेरे भाई) अब्दुर्रहमान रजि. को हुक्म दिया तो वह मेरे, उस उमरे के बदले जिसमें मैंने एहराम बांधा था, मुझे तनईम के मकाम से दूसरा उमरा करा लाये।
209 : आइशा रजि. से ही रिवायत है कि हम जुलहिज्जा के चांद के करीब हज को निकले तो रसुलल्लाह सल्लल्लाह अलैहि ने फरमाया कि जो आदमी उमरे का एहराम बांधना चाहे, वह उमरे का एहराम बांध ले और अगर मैं खुद हदी (कुर्वानी
का जानवर) न लाया होता तो उमरे का एहराम बांधता। इस पर कुछ लोगों ने उमरे का एहराम बांधा और कुछ ने हज का। उसके बाद आइशा रजि. ने पूरी हदीस बयान की और अपने हैज का भी जिक्र किया और फरमाया कि आपने मेरे साथ मेरे भाई अब्दुर्रहमान रजि. को तनईम के मकाम तक भेजा। वहां से मैंने उमरे का एहराम बांधा और इन सब बातों में न कुरबानी लाजिम हुई, न रोजा रखना पड़ा और न ही सदका देना पड़ा।
फायदे : इस हदीस में हैज के गुस्ल के वक्त अपने बाल खोलने का भी बयान है। जिसे इबारत में कमी की वजह से हजफ कर दिया गया है। क्योंकि इसका बयान पहले हो चुका है।
210 : आइशा रजि, से ही रिवायत हैं कि एक औरत ने उनसे पूछा कि क्या हमें पाकी के दिनों की नमाजें काफी हैं। हैज की नमाजों की क्या जरूरी नहीं? आइशा रजि ने फरमाया : तू हरूरीया (खारजी) मालूम होती है, हमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में हैज आता तो आप हमें नमाज की कजा का हुक्म नहीं देते थे, या फरमाया कि हम कजा नहीं पढ़ती थी।
फायदे : इस मसले पर इत्तिफाक हैं। अलबत्ता चन्द ख्वारिज का मानना है कि हैज वाली औरत को फरागत के बाद छूटी हुई नमाजों की कजा देना चाहिए। शायद इसी लिए हजरत आइशा रजि. ने सवाल करने वाली को हरूरीया कहा है। क्योंकि यह एक ऐसे मकाम की तरफ निसबत है, जहां खारजी इकट्ठे हुये थे।
211 : उम्मे सलमा रजि. से हैज के बारे में हदीस पहले गुजर चुकी है, जिसमें है कि वह हैज की हालत में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक चादर में लेटी होती थीं और उसमें यह भी बयान किया गया हैं कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रोजे की हालत में उनके साथ बोसो किनार (बोसा, चुम्मा लेते थे)करते थे।
212 : उम्मे अतिय्या रजि. से रिवायत है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते सुना है कि आजाद औरतें पर्दा नशीन औरतें और हैज वाली औरतें (सब ईद के लिए) बाहर निकलें और मुसलमानों की अच्छी मजलिसों
और दुआ में शामिल हों। मगर हैज वाली औरतें नमाज की जगह से अलग रहें, किसी ने पूछा कि हैज वाली औरतें भी शरीक हों? तो उम्मे अतिय्या रजि. ने जवाब दिया कि क्या हैज वाली औरतें अरफात और फलां फलां मकामात पर नहीं हाजिर होतीं?
213 : उम्मे अतिय्या रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि हम मटियालापन और जर्दी को कुछ न समझते थे। यानी उसे हैज खयाल न करते थे।
फायदे : अगर खास दिनों में इस रंग का खून निकले तो उसे हेज ही समझा जायेगा, अगर दूसरे दिनों में देखा जाये तो उसे हैज न खयाल किया जाये।
214 : आइशा रजि. से रिवायत है कि उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज किया ऐ अल्लाह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! (आपकी बीवी) सफिय्या को हैज आ गया है, आपने फरमाया, शायद वह हमें रोक रखेगी? क्या उसने तुम्हारे साथ तवाफे इफाजा नहीं किया? उन्होंने कहा तवाफ तो कर चुकी है, आपने फरमाया, तो फिर चलो (क्योंकि तवाफे विदा हैज वाली औरत के लिए जरूरी नहीं) ।
फायदे : तवाफे इफाजा जुलहिज्जा की दसवीं तारीख को किया जाता है, यह फर्ज और हज का रूकन है, अलबत्ता तवाफे विदा जो काअबा से रूख्सत होते वक्त किया जाता है, वह हैज वाली औरत के लिए जरूरी नहीं है।
215 : समुरा बिन जुन्दुब रजि. से रिवायत है कि एक औरत निफास के दौरान मर गयी तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसकी जनाजे की नमाज़ अदा की और जनाजा पढ़ते वक्त उसकी कमर के सामने खड़े हुए।
216 : मैमूना रजि. से रिवायत है कि जब वह हैज से होती और नमाज न पढ़ती तो भी नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सज्दागाह के पास लेटी रहती। नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी चादर पर नमाज पढ़ते, जब सज्दा करते तो आपका कुछ कपड़ा उनसे छू जाता था
फायदे : मालूम हुआ कि नमाज के बीच हैज वाली औरत से कपड़ा छू जाने या उसके बिस्तर की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ने में कोई हर्ज नहीं।
217 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि हम एक सफर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ निकले, जब हम बैदा या जातुल जैश पहुंचे तो मेरा हार टूट कर गिर गया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसकी तलाश के लिए कयाम फरमाया तो दूसरे लोग भी आपके साथ ठहर गये मगर वहां कहीं पानी न था लोग अबू बकर सिद्दीक रजि. के पास आये और कहने लगे, आप नहीं देखते कि आइशा रजि. ने क्या किया? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सब लोगों को ठहरा लिया और यहां पानी भी नहीं मिलता और न ही इनके पास पानी है। यह सुनकर अबू बकर सिद्दीक रज़ि. आये। उस वक्त रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम मेरी रान पर सर रखे आराम कर रहे थे। सिद्दीके अकबर रजि. कहने लगे, तुम ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सब लोगों को यहां ठहरा लिया, हालांकि उनके पास पानी नहीं है और न ही इस जगह हासिल होता है। आइशा रजि. फरमाती हैं कि अबू बकर सिद्दीक रजि. मुझ पर नाराज हुए और जो अल्लाह को मन्जूर था (वुरा-भला) कहा नीज मेरी कोख में हाथ से कचोका लगाने लगे लेकिन मैंने हरकत इसलिए न की कि मेरी रान पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सर मुबारक था। सुबह के वक्त जब इस बगैर पानी की जगह पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जागे तो अल्लाह तआला ने तयम्मुम की आयाते नाजिल फरमायी। चुनांचे लोगों ने तयम्मुम कर लिया। उस वक्त उसैद बिन हुजैर रजि. बोले, ऐ आले अबू बकर! यह कोई तुम्हारी पहली बरकत नहीं है, आइशा रजि. फरमाती हैं कि जिस ऊंट पर मैं सवार थी, हमनें उसे उठाया तो उसके नीचे से हार मिल गया।
फायदे : मालूम हुआ कि बाप अपनी बेटी की शादी के बाद भी उसे किसी बात पर डांट डपट कर सकता है। चूनाचे इस हदीस में है कि बाज सहाबा किराम रजि. ने वुजू और तयम्मुम के बगैर नमाज पढ़ ली, मालूम हुआ कि अगर वुजू के लिए पानी और मिट्टी न मिले तो यूँ ही नमाज़ पढ़ ली जाये।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “
*171 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह की राह में मुसलमान को जो जख्म लगता है, कयामत के दिन वह अपनी असल हालत में होगा, जैसे जख्म लगते वक्त था। खून बह रहा होगा, उसका रंग तो खून जैसा होगा, मगर खुश्बू कस्तूरी की तरह होगी।
फायदे : मुश्क हिरन की नाफ से निकलता है जो दरअसल खून है, मगर जब उसमें खूश्बू पैदा हो गयी तो उसका हुक्म खून का न रहा। इसी तरह पानी में गन्दगी गिरने से अगर उसका कोई गुण बदल जाये तो वो भी पाकी पर नहीं रहेगा, बल्कि नापाक हो जायेगा।
*172 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, तुममें से कोई ठहरे हुये पानी में पेशाब न करे, क्योंकि मुमकिन है कि उसमें फिर गुस्ल करने की जरूरत हो
फायदे : यह मनाअ अदब के तौर पर है, क्योंकि पड़े पानी में पेशाब करने के बाद अगर उससे नहाने की जरूरत पड़ी तो आदमी को उससे नफरत होगी।
*173 : अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार काबा के पास नमाज पढ़ रहे थे, अबू ज़हल और उसके साथी वहां बैठे हुये थे, वह आपस में कहने लगे, तूममें से कौन जाता है कि फलां कबीला की ऊँटनी की बच्चेदानी कि ले आये, जिसे वह सज्दा की हालत में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पीठ पर रख दे? चूनाचे एक बदबख्त उठा और उसे उठा लाया, फिर देखता रहा जब नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सज्दे में गये तो उसने उसे आपके दोनों कन्धों के बीच पीठ पर रख दिया मैं यह सब कुछ देख तो रहा था, लेकिन कुछ न कर सकता था। काश कि मुझे हिफाजत हासिल होती, फिर वह हंसते-हंसते एक दूसरे पर गिरने लगे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सज्दे ही में ही रहे। अपना सर नहीं उठाया, यहां तक कि फातिमा रजि. आई और आप की पीठ से उसे उठाकर फेंक दिया। तब आपने अपना सर मुबारक उठाया और तीन बार यूँ बद-दुआ की कि ऐ अल्लाह कुरैश से बदला ले, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यूँ बद-दुआ करना उन पर बड़ा भारी गुजरा, क्योंकि वह जानते थे कि इस शहर में दुआ कुबूल होती है, फिर आपने नाम-ब-नाम फरमाया या अल्लाह! अबू जहल से बदला ले, उतबा बिन रबीया, शैबा बिन रबीया, वलीद बिन उतबा, उमय्या बिन खलफ और उकबा बिन अबू मुईत की हलाकत को अपने ऊपर लाजिम कर, सातवें आदमी का भी नाम लिया, लेकिन रावी उसको भूल गया, अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने फरमाया : कसम है उसकी जिसके हाथ में मेरी जान है, मैंने उन लोगों को देखा जिनका नाम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लिया था, बदर के कुएं में मरे पड़े थे।
फायदे : इमाम बुखारी का यही मजहब है कि नमाज के दौरान गंदगी लगने से नमाज में खलल नहीं आता, अलबत्ता नमाज के शुरू में हर किस्म की पाकी का अहतमाम जरूरी है।
*174 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार इस उदार (नमाज की हालत में) अपने कपड़े में थूका।
फायदे : अगर मूंह में कोई गन्दगी न हो तो आदमी का थूक पाक है, और इससे पानी नापाक नहीं होता, ऐसे पानी से वुजू किया जा सकता है।
*175 : सहल बिन सअद रजि. से रिवायत है, लोगों ने उनसे सवाल किया कि नबी सललललाहु अलैहि वसल्लम के (उहद की लड़ाई के वक्त) जख्म पर कौनसी दवा इस्तेमाल की गई थी। उन्होंने ‘फरमाया कि इसके बारे में मुझ से ज्यादा जानने वाला कोई आदमी नहीं रहा। अली रजि. ढ़ाल में पानी लाते और फातमा रजि. आपके चेहरे मुबारक से खून धोती थीं, फिर एक चटाई जलाई गयी और आपके जख्म में उसे भर दिया गया।
फायदे : मालूम हुआ कि खून को रोकने के लिए चटाई की राख बेहतरीन दवा है। नीज दवा करना भरोसे के खिलाफ नहीं।
*176 : अबू मूसा अशअरी रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर हुआ तो आपको मिस्वाक करते देखा, मिस्वाक आपके मुंह में थी, आप औ ओ ओ की आवाज निकला रहे थे, जैसे कि (उल्टी) कर रहे हों।
फायदे : बुजू, नमाज, तिलावत, कुरआन, बेदारी, मुंह की खराबी में बल्कि हर वक्त मिस्वाक करना सुन्नत है, नजर की तेजी, मसूड़ों की मजबूती और किसी बात के याद रखने के लिए तो बहुत फायदेमन्द है, जिसको नई खोज ने भी माना है।
*177 : हुजैफा रजि. से रिवायत है, उन्हों ने फरमाया कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम जब रात को उठते तो पहले अपने मुंह को मिस्वाक से साफ करते थे।
*178 : इबने उमर रजि, से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, मैंने ख्वाब में अपने आपको मिस्वाक करते देखा, मेरे पास दो आदमी आये, उनमें से एक उम्र में दूसरे से बड़ा था मैंने उनमें से छोटे को मिस्वाक दे दी तो मुझ से कहा गया कि बड़े को दीजिए। तब मैंने वह मिस्वाक बड़े को दे दी।
फायदे : मालूम हुआ कि खाने, पीने और बातचीत करने में बड़ों को पहले मौका दिया जाना चाहिए, अगर तरतीब से बैठे हों तो दार्यी तरफ से शुरू किया जाये, इससे यह भी मालूम हुआ कि दूसरे की मिस्वाक इस्तेमाल की जा सकती है, लेकिन इसे धोकर साफ कर लेना बेहतर है।
*179 : बरा बिन आजिब रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझ से फरमाया, जब तुम अपने बिस्तर पर जाओ तो पहले नमाज की तरह वुजू करो और अपने दायें पहलू पर लेट कर यह दुआ पढ़ो। ऐ अल्लाह तेरे सवाब के शौक में और तेरे अजाब से डरते हुये मैंने अपने आपको तेरे हवाले कर दिया और तुझे ही ठिकाना देने वाला बना लिया। तुझ से भाग कर कहीं पनाह नहीं, मगर तेरे ही पास, ऐ अल्लाह! मैं इस किताब पर ईमान लाया, जो तू ने उतारी और तेरे इस नबी पर यकीन किया, जिसे तूने भेजा। अब अगर तू इस रात मर जाये तो इस्लाम के तरीके पर मरेगा, नीज यह दुआ सब बातों से फारिग होकर पढ़, हजरत बरा रजि. कहते हैं कि मैंने यह कलेमात आपके सामने दोहराये, जब मैं उस जगह पहुंचा, आमनतु बे किताबेकल्लंजी अंजलता उसके बाद मैंने व रसूले का कह दिया आपने फरमाया, नहीं बल्कि यूँ कहो “’व नबिय्ये कल्लजी अरसलता’”
फायदे : मालूम हुआ कि मसनून दुआयें और मासूरा जिक्रों में जो अलफाज रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मनकूल हैं, उनमें हेर-फेर नहीं करना चाहिए, हदीस में मजकूरा फजीलत उस आदमी को मिलती है जो जागते हुये आखिर में बुजू करता और आखरी गुफ्तगू के तौर पर यह दुआ पढ़ता है, नीज दार्यी तरफ लैटने से ज्यादा गफ्लत नहीं होती और शब खेजी के लिए आंख खुल जाती है, नीज इससे इमाम बुखारी का इशारा है कि यह हदीस किताबुल वुजू का खात्मा है।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “
*161 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है उन्होंने फरमाया कि एक देहाती खड़ा होकर मस्जिद में पेशाब करने लगा तो लोगों ने उसे पकड़ना चाहा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि ‘वसल्लम ने फरमाया कि उसे छोड़ दो और उसके पेशाब पर पानी से भरा हुआ एक डोल बहा दो, क्योंकि तुम लोग आसानी के लिए पैदा किये गये हो, तुम्हें सख्ती करने के लिए नहीं भेजा गया।
फायदे : दूसरी रिवायत में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे अपनी हाजत से फारिंग होने के बाद बुलाया और फरमाया कि मस्जिदें अल्लाह की याद और नमाज के लिए बनाई जाती है, इनमें पेशाब नहीं करना चाहिए। इस तरीके से उस पर बहुत असर हुआ और मुसलमान हो गया।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”
*162 : उम्मे कैस बिन्ते मेहसन रजि से रिवायत है कि वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के
पास अपना छोटा बच्चा लेकर आयी जो अभी खाना नहीं खाता था। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया तो उसने आपके कपड़े पर पेशाब कर दिया। आपने पानी मंगवाकर उस पर छिड़क दिया, लेकिन उसे धोया नहीं।
फायदे : मालूम हुआ कि लड़के के पेशाब पर पानी छिड़क देना काफी है, अलबत्ता लड़की के पेशाब को धोना जरूरी है।
*163 : हुजैफा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक कौम के कूड़ करकट के ढ़ेर पर तशरीफ लाये, वहां खड़े खड़े पेशाब किया। फिर पानी मंगवाया। मैं आपके पास पानी लाया और आपने वुजू फरमाया।
फायदे : अगर पेशाब के छीटे बदन पर पड़ने का डर न हो तो खड़े होकर पेशाब करने में कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि मनाअ की कोई हदीस नहीं है।
नोट : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आम तौर पर बैठ कर पेशाब करते थे।
*164 : हुजैफा रजि. से ही दूसरी रिवायत है, उन्होंने कहा कि जब आप पेशाब करने लगे तो मैं आपसे अलग हो गया और जब आपने मेरी तरफ इशारा किया तो मैं हाजिर होकर आपकी ऐड़ियों के करीब खड़ा हो गया, यहां तक कि आप पेशाब की हाजत से फारिंग हो गये।
फायदे : जब इन्सान की ओट ली जा सकती है तो दीवार की ओट और ज्यादा बेहतर होगी।
*165 : असमा विन्ते अबू बकर रजि. से रिवायत है कि उन्होंने कहा की एक औरत नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आयी और मालूम किया कि बताइये, हममें से अगर किसी औरत को कपड़े में हैज आ जाये तो कया करे? आपने फरमाया कि उसे खुरच डाले, फिर पानी डालकर रगड़े और साफ करके उसमें नमाज पढ़े।
फायदे : इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि गन्दगी दूर करने के लिए पानी को ही इस्तेमाल किया जाता है, दूसरी बहने वाली चीजें यानी सिरका वगैरह से धोना दुरूस्त नहीं।
*166 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि फातमा बिन्ते अबी हुबैश रजि. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आई और कहने लगीं कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मैं ऐसी औरत हूँ कि अक्सर मुस्तहाजा रहती हूँ और कई कई दिनों पाक नहीं होती, क्या नमाज छोड़ दूँ? आपने फरमाया, नमाज मत छोड़ो, यह एक रग का खून है जो हैज नहीं। फिर जब तेरे हैज का वक्त आ जाये तो नमाज छोड़ दो और जब वक्त गुजर जाये तो अपने बदन (और कपड़ों) से खून धोकर उसके बाद नमाज पढ़ो। अलबत्ता हर नमाज के लिए नया वुजू करती रहो, यहां तक कि फिर हैज का वक्त आ जाये।
फायदे : इस्तिहाजा एक बीमारी है, जिसमें औरत का खून जारी रहता है, बन्द नहीं होता, इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि जिसे हवा या पेशाब के कतरे आने की बीमारी हो, वह भी नमाज के लिए ताजा वुजू करके उसे अदा करता रहे।
*167 : आइशा रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के (कपड़े से) नापाकी के निशानों को धो डालती थी, फिर आप नमाज के लिए बाहर तशरीफ ले जाते, अगरचे आपके कपड़े में पानी के धब्बे बाकी रहते थे।
फायदे : नापाकी के निशान अगर खुश्क हो चुके हों तो उन्हें खुरच देना ही काफी है, धोने की जरूरत नहीं।
*168 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने बयान किया कि उक्ल या उरैना के चन्द लोग मदीना मुनव्यरा आये, यहां का हवा पानी उनके मवाफिक
न आया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें हुक्म दिया कि वह (जंगल में सदके की) ऊंटनियों के पास चले जायें और वहां उनका पेशाब और दूध पीयें। चूनाचे वह चले गये और जब तन्दुरूस्त हो गये तो उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरवाहे को कत्ल कर डाला और जानवर हौंक कर ले गये। सुबह के वक्त ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब यह खबर पहुंची तो आपने उनकी तलाश में आदमी रवाना किये। सूरज बुलन्द होने तक सब को गिरफ्तार कर लिया गया चूनांचे आपके हुक्म पर उनके हाथ पांव काटे गये, आंखों में गर्म सलाईयां फेरी गयीं और गर्म पथरीली जगह पर उन्हें डाल दिया गया, वह पानी मांगते लेकिन उन्हें पानी न दिया जाता।
फायदे : इससे मालूम हुआ कि हलाल जानवरों का गोबर और पेशाब गन्दा नहीं है, तभी तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें ऊंटनियों का पेशाब पीने का हुक्म दिया। और उन्होंने जो सलूक चरवाहे के साथ किया था, वही सलूक उनके साथ किया गया।
*169 : अनस रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिदे नबवी से पहले बकरियों के बाड़ों में नमाज पढ़ लिया करते थे।
फायदे : जाहिर है कि बकरियाँ वहां पेशाब वगैरह करती हैं, इसके बावुजूद आपने वहां नमाज पढ़ी, मालूम हुआ कि उनका पेशाब वगैरह नापाक नहीं अलबत्ता ऊंटों के बाड़ों में नमाज पढ़ाना मना है, क्योंकि उनके मस्ती में आने से नुकसान का डर है।
*170 : मैमूना रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम से एक चूहिया के बारे में पूछा गया जो घी में गिर गयी थी । आपने फरमाया कि उसे निकाल दो और उसके करीब जिस कदर घी हो, उसे फैंक दो फिर अपने बाकी घी को इस्तेमाल कर लो।
फायदे : कुछ रिवायतों में ”जामिद”’ के अल्फाज हैं,मालूम हुआ कि अगर पिघला हुआ हो तो इस्तेमाल के काबिल नहीं और न ही उसे बेचना जाइज है। शहद वगैरह का भी यही हुक्म है। चूंकि पानी बहने वाला होता है, इसलिए वह भी गन्दा होगा।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “
*151 : अब्र बिन उमय्या जुमरी रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपनी पगड़ी और दोनों मोजों पर मसह करते हुये देखा है।
फायदे : मोजों पर मसह के लिए शर्त यह है कि उन्हें पहले वुजू की हालत में पहना हो, लेकिन पगड़ी पर मसह के लिए कोई शर्त नहीं है। मसह की मुद्दत मुसाफिर के लिए तीन दिन और तीन रात और मुकीम के लिए एक दिन और एक रात है। नीज इस मुद्दद का आगाज वुजू टूटने के बाद होगा।
*152: मुगीरा बिन शोअबा रजि से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैं एक सफर में नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ था (आप बुजू कर रहे थे) मैं झुका ताकि आपके दोनों मोजों को उतार दूँ तो आपने फरमाया। इन्हें रहने दो, मैंने इनको बावुजू पहना था, फिर आपने उन पर मसह फरमाया।
*153 : उम्र बिन उमय्या जुमरी रजि से रिवायत है, उन्होंने रसूलुल्लाह ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप बकरी के शाने का गोश्त काट कर खा रहे थे। इतने में आपको नमाज के लिए बुलाया गया, यानी अजान हो गयी तो आपने छूरी रख दी, फिर नमाज पढ़ाई और नया वुजू न किया।
फायदे : मालूम हुआ कि छुरी से गोश्त काटकर खाना सुन्नत है। हदीस में अगरचे सत्तू का जिक्र नहीं चूंकि यह भी गोश्त की तरह आग पर पकाये जाते है। इसलिए दोनों का हुक्म एक ही है कि इनके इस्तेमाल से वुजू नहीं टूटता।
*154 : सुवैद बिन नोमान रजि. से रिवायत है कि वह फतहे खैबर के साल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमके साथ गये थे, जब मकाम सहबा पर पहुंचे जो खैबर के करीब था तो आपने नमाज असर पढ़ी, फिर खाने-पीने का सामान मंगवाया, तो सिर्फ सत्तू लाया गया। आपने उसे तैयार करने का हुक्म दिया। चूनाचे वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसत्लम और हम सब ने खाया, उसके बाद आप नमाज मगरिब के लिए खड़े हुये। आपने सिर्फ कुल्ली फरमायी और हमने भी कुल्ली की। फिर आपने नमाज पढ़ाई और नया वुजू नहीं किया।
*155 : मैमूना रजि, से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके यहां शाना (गोश्त) खाया फिर नमाज अदा की और नया हक बुजू नहीं फरमाया।
फायदे : इस हदीस में गोश्त खाने के बाद कुल्ली करने का जिक्र नहीं। मालूम हुआ कि कुल्ली करना बेहतर है, जरूरी नहीं।
*156 : अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहिं वसल्लम ने एक बार दूध पिया तो कुल्ली की और कहा कि दूध में चिकनाई होती है।
फायदे : मालूम हुआ कि चिकनाई वाली चीज खाकर कुल्ली करना चाहिए ।
*157 : आइशा रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब तुममें से कोई नमाज पढ़ रहा हो, उस दौरान अगर ऊंघ आ जाये तो वह सो जाये ताकि उसकी नींद पूरी हो जाये, क्योंकि ऊंघते हुये अगर कोई नमाज पढ़ेगा तो वह नहीं जानता कि अपने लिए माफी की दुआ कर रहा है, या खुद को बद-दुआ दे रहा है।
फायदे : नींद जाति तौर पर बुजू तोड़ने वाली नहीं, बल्कि बे-वुजू होने का जरीया जरूर है, बशर्ते कि इन्सान की अकल व शउर पर गालिव आ जाये।
*158 : अनस रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जब कोई तुम में से नमाज के दौरान ऊंघने लगे तो उसे सो लेना चाहिए, ताकि नींद जाती रहे और जो पढ़ रहा है उसको समझने के काबिल हो जाये।
फायदे : ऊंघ यह है कि इन्सान अपने पास वाले की बात तो सुने, लेकिन समझ न सके, ऐसी हालत में नमाजी को चाहिए कि वह सलाम फेरे फिर सो जाये, चूंकि ऐसी हालत में अदा की हुई नमाज को दोहराने का आपने हुक्म नहीं दिया तो मालूम हुआ कि ऊंघने से वुजू नहीं दूटता।
*159: अनस रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर नमाज के लिए वुजू किया करते थे, फिर अनस रजि ने फरमाया कि हमें तो एक ही वुजू काफी होता है, जब तक कि हवा न निकले ।
फायदे : हर नमाज के लिए ताजा वुजू करना बेहतर है, जरूरी नहीं। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फतह मक्का के मौके पर पांचों नमाजें एक ही बुजू से पढ़ी थी। वुजू पर वुजू करना अच्छा अमल है। क्योंकि यह रोशनी पर रोशनी है।
*160 : इबने अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना या मक्का के किसी बाग से गुजरे तो वहां दो आदमियों की आवाज सुनी, जिनको कब्र में अजाब हो रहा था, उस वक्त आपने फरमाया कि इन दोनों को अजाब हो रहा है, लेकिन यह किसी बड़ी बात पर नहीं दिया जा रहा, फिर फरमाया, की (बड़ी ही है)। उनमें से एक तो अपने पेशाब से न बचता था और दूसरा चुगलखोरी करता था। फिर आपने खजूर की एक तर शाख मंगवाई, उसके दो टुकड़े करके हर कब्र पर एक टुकड़ा रख दिया, आपसे मालूम किया गया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया फरमाया : उम्मीद है कि जब तक यह नहीं सूखेगी, इन दोनों पर अजाब कम रहेगा।
फायदे : यह हदीस खुली दलील है कि अजाब जमीनी कब्र में होता है और जिन लोगों को यह कब्र नहीं मिले, उनके लिए वही कब्र है, जहां उनके जर्रात पड़े हैं। कुरआन व हदीस में इसके अलावा किसी बरजखी कब्र का वजूद साबित नहीं होता, जैसा कि बाज फितना फैलाने वाले लोगों का ख्याल है।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”
*141 : अबू जुहैफा रजि. से रिवायत है, थी उन्होनें फरमाया कि एक दिन रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम दोपहर के वक्त हमारे यहां तशरीफ लाये। वुजू का पानी आपके पास लाया गया। आपने बुजू फरमाया, फिर लोग आपके बुजू का बाकी बचा पानी लेने लगे और बदन पर मलने लगे। फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जुहर और असर की दो दो रकअतें नमाज पढ़ी और (नमाज के दौरान) आपके सामने एक बरछी गाड़ दी गयी।
फायदे : इस हदीस में इस्तेमाल किये हुए पानी का हुक्म बयान किया गया है। कुछ लोग इसे दोबारा इस्तेमाल के काबिल नहीं समझते, कत-ए-नजर कि वह पानी जो वुजू के बाद बर्तन में बचा रहे या वह पानी जो बुजू करने वाले के अंगों से टपके। मालूम हुआ कि इस किस्म के पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। नीज यह मक्का मुर्करमा का वाक्या है। इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि वहां भी इमाम और अकेले नमाज पढ़ने वाले को नमाज के लिए आगे सुतरा रखना जरूरी है।
*142 : साइब बिन यजीद रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मेरी खाला मुझे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास ले गई और मालूम किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरा भानजा बीमार है तो आपने मेरे सर पर हाथ फैरा और मेरे लिए बरकत की दुआ फरमायी। फिर आपने वुजू फरमाया और मैंने आपके वुजू का बचा हुआ पानी पी लिया। फिर मैं आपकी पीठ के पीछे खड़ा हुआ और नबूवत की मोहर को देखा जो आपके दोनों कन्धों के बीच छपरकट की घुंडी की तरह थी।
फायदे : मालूम हुआ कि बीमार बच्चे किसी बुजुर्ग के पास दुआ के लिए ले जाना तकवा के खिलाफ नहीं। नीज बच्चों से प्यार और उनके लिए खैर और बरकत की दुआ करना सुन्नत नबवी है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दुआ का नतीजा था कि हजरत साइब चौरानवें साल की उम्र में भी तन्दुरूस्त व जवान थे।
*143 : इब्ने उमर रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में मर्द और औरत सब मिलकर (एक ही बर्तन से) वुजू किया करते थे।
फायदे : मुमकिन है कि मर्द और औरतों का मिलकर वुजू करना पर्दा उतरने से पहले का हो या इससे वह मर्द और औरतें मुराद हों जो एक दूसरे के लिए हराम हो या इससे मुराद मियां-बीवी हो। इस हदीस का यह भी मतलब बयान किया जाता है कि मर्द एक जगह मिलकर वुजू करते और औरतें उनसे अलग एक जगह मिलकर वुजू करतीं।
* 144 : जाबिर रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मुझे देखने के लिए तशरीफ लाये। मैं ऐसा सख्त बीमार था कि कोई बात न समझ सकता था। आपने वुजू फरमाया और वुजू से बचा हुआ पानी मुझ पर छिड़का तो मैं होश में आ गया,
मैंने मालूम किया ऐ अल्लाह के रसूल! मेरा वारिस कौन है? मैं तो कलाला हूँ तब विरासत की आयत नाजिल हुईं।
फायदे : कलाला उसको कहते हैं, जिसका न बाप दादा हो और न ही उसकी कोई औलाद हो, मालूम हुआ कि बीमार की तीमारदारी करना चाहिए, चाहे बड़ा हो या छोटा।
*145 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि एक बार नमाज का वक्त हो गया, तो जिस आदमी का घर करीब था यह तो अपने घर (वुजू करने के लिए) चला गया, सिर्फ चन्द लोग रह गये, फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास एक बर्तन लाया गया, जिसमें पानी था, वह इतना छोटा था कि आप अपनी हथेली उसमें न फैला पके, लेकिन फिर भी सब लोगों ने उससे वुजू कर लिया। अनस से पूछा गया कि तुम उस वक्त कितने लोग थे? उन्होंने कहा 80 से कुछ ज्यादा।
फायदे : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इस किस्म के करिश्मों का कई बार जहूर हुआ, वुजू करने वालों की तादाद कम या ज्यादा इसी बिना पर है।
*146 : अबू मूसा अशअरी रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार प्याला मंगवाया, जिसमें पानी था। आपने उससे हाथ मुंह धोया और कुल्ली फरमायी।
फायदे : अगरचे इस हदीस में वुजू का जिक्र नहीं फिर भी हाथ मुंह धोना वुजू के कामों में से हैं, मुमकिन हैं कि आपने पूरा वुजू किया हो, लेकिन रावी ने इसका जिक्र नहीं किया।
*147 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि जब नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम बीमार हुये और तकलीफ बढ़ गयी तो आपने अपनी बीवियों से इजाजत चाही कि मेरे घर में आप की तीमारदारी की जाये। सब ने आपको इजाजत दे दी तब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो आदमियों का सहारा लेकर निकले पर आपके दोनों कदम जमीन पर घिसटते जाते थे। हजरत अब्बास रजि. और एक दूसरे आदमी (हजरत अली रजि.) के साथ आप निकले थे। आइशा रजि. का बयान है,जब नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम अपने घर तशरीफ ले आये और आपकी बीमारी और ज्यादा हो गयी तो आपने फरमाया कि मेरे ऊपर ऐसी सात मश्कें बहाओ जिनके मुंह न खोले गये हों ताकि मैं लोगों को कुछ वसीयत करूं। फिर आपको मोमिनों की माँ हफसा रजि. के लगन (टब) में बिठा दिया गया, उसके बाद हम सब आपके ऊपर पानी बहाने लगे, यहां तक कि आप हमारी तरफ इशारा करने लगे, “बस-बस” तुम अपना काम पूरा कर चुकी हों फिर आप लोगों के पास तशरीफ ले गये।
फायदे : बुखार की हालत में ठण्डे पानी से नहाना खासकर जब सफरावी बुखार हो, इन्तहाई मुफीद है, जिसको नई खोज ने भी माना है।
*148 : अनस रजि. से ही रिवायत है,उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब गुस्ल फरमाते तो एक साअ से लेकर पांच मुद तक पानी इस्तेमाल करते और एक मुद पानी से वुजू कर लेते।
फ़ायदे : नई खोज के मुताबिक साअ का वजन 2 किलो 100 ग्राम । वुजू और गुस्ल के लिए लोगों और हालात के पेशे नजर पानी की मिकदार में कमी और ज्यादती हो सकती है। फिर भी इस सिलसिले में फिजूल खर्ची करना जाइज नहीं।
*149 : साद बिन अबी वककास रजि से रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मोजों पर मससह किया, अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. ने उमर रजि. से यह मसला पूछा तो उन्होंने कहा, हाँ आपने मोजों पर मसह किया है और कहा जब साद रजि. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोई हदीस तुझ से बयान करें तो किसी दूसरे से उसके बारे में मत पूछा करो।
*150 : अमन बिन उमय्या जुमरी रजि. से रिवायत है कि उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मोजों पर मसह करते हुये देखा है।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”
*131 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने बयान किया कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस हालत में देखा कि असर की नमाज का वक्त हो चुका था, लोगों ने बुजू के लिए पानी तलाश किया, मगर न मिला। आखिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास एक बर्तन में वुजू के लिए पानी लाया गया तो आपने अपना हाथ मुबारक उस बर्तन में रख दिया और लोगों को हुक्म दिया कि इससे वुजू करें। अनस रजि कहते हैं कि मैंने देखा कि पानी आपकी उंगलियों के नीचे से फूट रहा था, यहां तक कि सब लोगो ने वुजू कर लिया।
फायदे : वुजू करने वालों की तादाद तीन सौ के लगभग थी, इसमें आपका एक बहुत बड़ा करिश्मा (मौअजजा) था।
*132 : अनस रजि. से ही रिवायत है रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने जब (हज में)अपना सर मुण्डवाया तो सबसे पहले अबू तल्हा रजि. ने आपके बाल लिये थे।
फायदे : इससे मालूम हुआ कि आदमी के बाल पाक हैं और उन्हें धोने के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी भी पाक रहता है।
*133 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है ‘कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब कुत्ता तुम में से किसी के बर्तन में से पी ले तो चाहिए कि उस बर्तन को सात बार धोयें ।
फायदे : नई खोज ने भी इस बात की तसदीक की है कि कुत्ते के थूक में ऐसे जहरीले जरासीम (किटाणु) होते हैं, जिन्हें सिर्फ मिट्टी ही खत्म करती है। इसलिए आपने पानी के साथ मिट्टी से साफ करने का भी हुक्म दिया है।
*134 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुबारक जमाने में कुत्ते मस्जिद में आते जाते थे और सहाबा किराम वहां किसी जगह पर पानी नहीं छिड़कते थे।
फ़ायदे : यह इस्लाम की शुरूआती दौर का किस्सा है। उसके बाद मस्जिद की पाकी और इज्जत को बरकरार रखने के लिए दरवाजे लगा दिये गये।
*135 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि बन्दा बराबर नमाज में है, जब तक कि मस्जिद में नमाज का इन्तेजार करता रहे, यहां तक कि बेवुजू न हो जाये।
फायदे : इस हदीस के आखिर में है कि किसी अज्मी ने हजरत अबू हुरैरा रजि. से हदस होने के बारे में सवाल किया तो आपने फरमाया, हलके या जोर से हवा का खारिज होना हदस है, अगरचे इसके अलावा दीगर चीजों से भी वुजू टूट जाता है लेकिन नमाजी को मस्जिद में बैठे आमतौर पर इस किस्म के हदस से वास्ता पड़ता है। हदीस में यह भी है कि मस्जिद में नमाज का इन्तेजार करने वाले के लिए फरिश्ते रहमत व बख्शिश की दुआ करते रहते हैं।
*136 : जैद बिन खालिद रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैंने उसमान रजि. से पूछा अगर कोई आदमी अपनी औरत से मिले लेकिन इन्जाल न हो (मनी ना निकले) तो उस पर गुस्ल है या नहीं?) उन्होंने जवाब दिया कि वह नमाज के वुजू की तरह वुजू करे और अपनी शर्मगाह को धो डाले, फिर उसमान रजि. ने फरमाया कि मैंने यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना है (जैद कहते हैं) चूनांचे मैंने यह सवाल अली, तलहा,
जुबैर और उबय्यी बिन क-अ-ब रजि. से पूछा, उन्होंने भी मुझे यही जवाब दिया।
फायदे : इन्जाल न होने की सूरत में गुस्ल न करने का हुक्म खत्म हो चुका है, क्योंकि आखरी हुक्म यह है कि स्वाली औरत के पास जाने से ही गुस्ल वाजिब हो जाता है, चाहे मनी निकले या न निकले चारों इमामों और ज्यादातर आलिमों का यही खयाल है, अलबत्ता इमाम बुखारी का रूजहान यह है कि ऐसी हालत में अहतयातन गुस्ल कर लिया जाये।
*137 : अबू सईद खुदरी रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक अन्सारी आदमी को बुला भेजा, वो इस हालत में हाजिर हुआ कि उसके सर से पानी टपक रहा था। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाया, शायद हमने तुझे जल्दी में डाल दिया है। उसने कहा. “जी हाँ”। तब आपने फरमाया कि डाल दिया है। उसने कहा, “जी हाँ”। तब आपने फरमाया कि जब तू जल्दी में पड़ जाये या तेरी मनी रूक जाये (इन्जाल न हो) तो बुजू कर लिया कर (गुस्ल जरूरी नहीं) ।
फायदे : ऐसी हालत में गुस्ल जरूरी न होने का हुक्म अब खत्म हो चुका है, जैसा कि हजरत आइशा रजि. और हजरत अबू हुरैरा रजि. से मरवी हदीसों में इसका खुलासा मौजूद है।
*138 : मुगीरा बिन शोबा रजि. से रिवायत है कि वह एक सफर में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे, आप पाखाना के लिए तशरीफ ले गये (जब वापस आये तो) मुगीरा रजि आप (के अंगों) पर पानी डालने लगे और आप बुजू कर रहे थे। आपने अपना मुंह और दोनों हाथ धोये, सर और मोजों पर मसह फरमाया।
*139 : इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है कि वह एक रात अपनी खाला और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी मैमूना रजि. के घर में थे। उन्होंने कहा कि मैं तो बिस्तर की चौड़ाई में लैटा जबकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनकी बीवी उसकी लम्बाई में लैटे थे। फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आराम फरमाया, जब आधी रात हुई या उससे कुछ कम और ज्यादा तो आप उठ गये और बैठकर अपनी आंखें हाथ से मलने लगे फिर सूरा अल इमरान की आखरी दस आयतें पढ़ी, उसके बाद आप एक लटकी हुई एक पुरानी मश्कीजे की तरफ खड़े हुये, उसमें से अच्छी तरह वुजू किया, फिर खड़े होकर नमाज पढ़ने लगे। इब्ने अब्यास रजि. ने फरमाया, फिर मैं भी उठा और जैसे आपने किया था, मैंने भी किया, फिर आपके पहलू में खड़ा हुआ। आपने अपना दायां हाथ मेरे सर पर रखा और मेरा दायां कान पकड़कर उसे मरोड़ने लगे। उसके बाद आपने (तहज्जुद की) दो रकअतें पढ़ी, फिर दो रकआतें, फिर दो रकअतें, फिर दो रकअर्तें, फिर दो रकअतें, फिर दो रकअतें (कुल बारह रकअतें) अदा की। फिर वित्र पढ़ा, उसके बाद लेट गये, यहां तक कि अजान देने वांला आपके पास आया, उस वक्त आप खड़े हुये और हल्की फुल्की दो रकअतें (फज की सुननतें) पढ़ीं फिर बाहर तशरीफ ले गये, और फज्र की नमाज पढ़ायी।
यह हदीस (97) में गुजर चुकी है, लेकिन हर एक तरीके का फायदा दूसरे तरीके से कुछ अलग है।
फायदे : इमाम बुखारी की दलील हजरत इबने अब्बास रजि, के अमल से है, क्योंकि आपने कुरआनी आयतें बे-वुजू तिलावत की थीं। ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए नींद वुजू तोड़ने वाली नहीं, मुमकिन है कि आप का वुजू करना किसी और वजह से हुआ। ऐसी हालत में रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के अमल से भी दलील ले सकते हैं।
*140 : अब्दुल्लाह बिन जैद रजि. से रिवायत है कि उनसे एक आदमी ने पूछा, क्या मुझे दिखा सकते हो कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ‘वसल्लम कैसे बुजू करते थे? उन्होंने कहा, हां, फिर उन्होंने पानी मंगवाया और अपने हाथों पर पानी डाला, उन्हें दो बार धोया, फिर तीन बार कुल्ली की और नाक में पानी डाला, फिर अपने मुंह को तीन बार धोया, फिर दोनों हाथ कुहनियों तक दो दो बार धोये उसके बाद दोनों हाथों से सिर का मसह किया, यानी उनको आगे और पीछे ले गये (मसह) सिर के शुरू हिस्से से किया और दोनों हाथ गुद्दी तक ले गये, फिर दोनों को वहीं तक वापस लाये, जहां से शुरू किया था। उसके बाद अपने दोनों पांव धोये।
फ़ायदे : मालूम हुआ कि एक ही चुल्लू से कुल्ली और नाक में पानी डाला जा सकता है। नीज सिर का मसह सिर्फ एक बार करना है और पूरे सिर का मसह किया जायेगा।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “
*121: अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि एक दिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पाखाना के लिए बाहर गये तो मैं भी आपके पीछे हो लिया, आपकी आदत मुबारक थी कि चलते वक्त दायें बायें न देखते थे। जब मैं आपके करीब गया तो आपने फरमाया कि मुझे पत्थर तलाश कर दो, मैं उनसे इस्तिंजा करूंगा (या उसी जैसा कोई और लफ्ज फरमाया) लेकिन हड्डी और गोबर न लाना। चूनांचे मैं अपने कपड़े के किनारे में कई पत्थर लेकर आया और उन्हें आपके पास रख दिया और खुद एक तरफ हट गया। फिर जब आप पाखाने से फारिग हुये तो पत्थरों से इस्तिंजा फरमाया।
फायदे : हड्डी जिन्नों की खुराक है और गोबर उनके जानवरों का चारा है। इसलिए इन से इस्तिंजा करना मना है।
*122 : अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार पाखाना के लिए तशरीफ ले गए और मुझे तीन पत्थर लाने का हुक्म दिया मुझे दो पत्थर तो मिल गये, लेकिन तलाश करने पर भी तीसरा पत्थर न मिल सका। मैंने गोबर का एक सूखा टुकड़ा उठा लिया और वो आपके पास लाया, आपने दोनों पत्थर ले लिये। गोबर को फैंक दिया और फरमाया, यह गन्दा है।
फायदे : गोबर का टुकड़ा दरअसल गधे की लीद थी, जिसे आपने नापाक करार दिया, फिर आपने तीसरा पत्थर मंगवाया ।
*123 : इने अब्यास रजि. से रिवायत है। उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वुजू में अंगों को एक एक बार धोया।
फायदे : मालूम हुआ कि अंगो को एक एक बार धोने से भी फर्ज अदा हो जाता है।
*124 : अब्दुल्लाह बिन जैद अन्सारी रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने वुजू के अंगों को दो दो बार धोया।
फायदे : यह अब्दुल्लाह बिन जैद बिन आसिम अन्सारी माजनी हैं, और अजान का ख्वाब देखने वाले अब्दुल्लाह बिन जैद बिन अब्दे रब्बेही हैं जो दुसरे सहाबी हैं ।
*125 : उस्मान बिन अफ्फान रजि. से रिवायत है कि उन्होंने एक बार पानी का बर्तन मंगवाया और अपने हाथों पर तीन बार पानी डालकर न धोया, फिर दायें हाथ को बर्तन में डालकर पानी लिया, कुल्ली की, नाक में पानी डाला और उसे साफ किया। फिर अपने मुंह और दोनों हाथों को कुहनियों समेत तीन बार धोया, उसके बाद सर का मसह किया, फिर अपने पांव टखनें समेत तीन बार धोये, फिर कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जो भी मेरे इस बुजू की तरह वुजू करे और फिर दो रकअत अदा करे और इनके अदा करने के वक्त कोई खयाल दिल में न लाये तो उसके तमाम पिछले गुनाह बख्श दिये जायेंगे।
फायदे : बुखारी की एक रिवायत में है कि इस बख्शिश पर घमण्ड भी नहीं करना चाहिए कि अब दीगर अमलों की क्या जरूरत है?
*126 : उस्मान बिन अफ्फान रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं तुम्हें एक हदीस सुनाऊँ अगर कुरआन में एक आयत न होती तो यह हदीस तुम्हें न सुनाता। मैंने नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुये सुना है, जो आदमी अच्छी तरह वुजूं करे और नमाज पढ़े तो जितने गुनाह इस नमाज से दूसरी नमाज तक होंगे वो बख्श दिये जायेंगे और वो आयत यह हैः बेशक वो लोग जो हमारी नाजिल की हुई आयातों को छुपाते हैं….. आखिर तक (बकरा 161)
*127 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो कोई बुजू करे तो अपनी नाक साफ करे और पत्थर से इस्तिंजा करे तो ताक पत्थरों से करे।
फायदे : इससे मालूम हुआ कि नाक में पानी डालकर इसे साफ करना बुजू के लिए सिर्फ सुन्नत ही नहीं बल्कि फर्ज है, क्योंकि यह आपका हुक्म है।
*128 : अबू हुरैरा रजि, से ही रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जब तुममें से कोई वुजू करे तो अपनी नाक में पानी डाले और उसे साफ करे और जो आदमी पत्थर से इस्तिंजा करे तो ताक पत्थरों से करे और तुममें से जब कोई सोकर उठे तो वुजू के पानी में अपने हाथ डालने से पहले उन्हें धो ले क्योंकि तुम में से किसी को खबर नहीं कि रात को उसका हाथ कहां फिरता रहा है।
फायदे : नाक झाड़ने से शैतान भाग जाता है, जो आदमी की नाक पर रात गुजारता है।
*129 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि से रिवायत है कि एक बार उन पर किसी ने ऐतराज करते हुये कहा कि मैं देखता हूँ आप हजरे अवसद (काला पत्थर) और रूकने यमानी के अलावा बैतुल्लाह के किसी कोने को हाथ नहीं लगाते और आप सिब्ती जूते पहनते हो और पीला खिजाब इस्तेमाल करते हो, नीज मक्का में दूसरे लोग तो जुलहिज्जा का चांद देखते ही एहराम बांध लेते हैं। मगर आप आठवीं तारीख तक एहराम नहीं बांधते। इन्ने उमर
रजि ने जवाब दिया कि बैतुल्लाह के कोनों को छुने की बात तो यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दोनों यमानी (हजरे असवद, रूकने यमानी) के अलावा किसी दूसरे रूकन को
हाथ लगाते नहीं देखा और सुब्ती जूतियों के बारे में यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम को जूतियाँ पहने देखा, जिन पर बाल न थे और आप उनमें वुजू फरमाते थे। लिहाजा मैं उन जूतों को पहनना पसन्द करता हूँ, रहा जर्द रंग का मामला तो मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह खिजाब लगाते हुये देखा है इसलिए मैं भी इस रंग को पसन्द करता हूँ और एहराम बांधने की बात यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उस वक्त तक एहराम बांधते नहीं देखा, जब तक आपकी सवारी आपको लेकर न उठती, यानी आठवीं तारीख को।
फायदे : जूतों पर मसह करने की रिवायतें जईफ हैं इसलिए पांव धोने चाहिए। दलील की बुनियाद यह है कि वुजू में असल अंगों का धोना है। नीज अगर मसह किया हो तो ”य-त-वज्जओ फीहा” के बजाये “य-त-वज्जओ अलैहा” होना चाहिए था।
*130 : आइशा रजि. से रिवायत है, उन्हीं ने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जूता पहनना, कंघी करना और सफाई करना अलगर्ज हर अच्छे की शुरूआत दायें जानिब से
करना अच्छा मालूम होता था।
फायदे : पाखाना में दाखिल होना, मस्जिद से निकलना, नाक साफ करना और इस्तिंजा करना, इस हुक्म से अलग हैं।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”
*111 :- उसामा बिन जैद रजि से रिवायत है कि एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अरफात से लौटे, जब घाटी में पहुंचे तो उतर कर पेशाब किया फिर वुजू फरमाया, लेकिन वुजू पूरा न किया, मैंने मालूम किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! नमाज का वक्त करीब है। आपने ‘फरमाया: नमाज आगे चलकर पढ़ेंगे, फिर आप सवार हुये जब मुजदलफा आये तो उतरे और पूरा वुजू किया, फिर नमाज की तकवीर कही खयी, और जब आपने मगरिब की नमाज अदा की, उसके बाद हर आदमी ने अपना ऊंट अपने मकाम पर बैठाया, फिर इशा की तकबीर हुई और आपने नमाज पढ़ी, और दोनों के बीच निफ्ल वगैरह नहीं पढ़ी।
फायदे : पूरे वुजू से मुराद अपने वुजू के हिस्सों को खूब मलकर धोना है और इस हदीस से मालूम हुआ कि वुजू करते वक्त किसी दूसरे से मदद लेना जाइज है।और हज के दौरान मुजदलफा में मगरिब और इशा को जमा करके पढ़ना चाहिए।
*112 :- इबने अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने वुजू किया और अपना मुंह धोया, इस तरह कि पानी का एक चुल्लू लेकर उससे कुल्ली की और नाक में पानी डाला, फिर एक और चुल्लू पानी लिया, हाथ मिलाकर उससे मुंह धोया, फिर एक चुल्लू पानी से अपना दायां हाथ धोया, फिर एक और चुल्लू पानी लिया और उससे अपना बायां हाथा धोया, फिर अपने सर का मसह किया उसके बाद एक चुल्लू पानी अपने दायें पांव पर डाला और उसे धो लिया, फिर दूसरा चुल्लू पानी लेकर अपना बांया पांव धोया उसके बाद कहने लगे कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इसी तरह करते हुये देखा है।
फायदे : मतलब यह है. कि बुजू के लिए दोनों हाथों से चुल्लू भरना जरूरी नहीं, नीज उन रिवायतों के जईफ होने की तरफ इशारा है, जिनमें है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक ही हाथ से अपने चहरे को धोते थे। इससे यह भी मालूम हुआ कि एक चुल्लू लेकर आधे से कुल्ली की जाये और आधे से नाक साफ करे।
*113 :- अनस रजि. से रिवायत है, उन्हों ने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब बैतुलखला जाते तो फरमाते, ऐ अल्लाह मैं नापाक चीजों और नापाकियों से तेरी पनाह चाहता हूँ।”
फायदे : इस दुआ का दूसरा तर्जुमा यह है कि “ऐ अल्लाह!” मै खबीस जिन्नातों और जिननातनियों से तेरी पनाह चाहता हूँ” लैटरीन में दाखिल होने और अपना कपड़ा उठाने से पहले पढ़नी चाहिए।
*114 :- इबने अब्बास रजि.से रिवायत है कि एक बार नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पाखाना के लिए गये तो मैंने आपके लिए वुजू कर पानी रख दिया! आपने (बाहर निकलकर) पूछा कि यह पानी किसने रखा हैं? आपको बता दिया गया तो आपने फरमाया, अल्लाह इसे दीन की समझ अता फरमा।”
फायदे : हजरत इब्ने अब्बास रजि. ने यह खिदमत बजा लाकर अकलमन्दी का सबूत दिया था। ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके लिए वैसी ही दुआ फरमायी, और अल्लाह तआला ने उसे कुबूल भी फरमाया और हजरत इन्ने अब्बास हिबरूल उम्मा (उम्मत के आलिम) के लकब से मशहूर हो गये।
*115 :- अबू अय्यूब अन्सारी रजि. से रिवायत है, उन्हों ने कहा, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब कोई पेशाब और पाखाना के लिए जाये तो किब्ला की तरफ मूंह न करे, न पीठ, बल्कि पूर्व या पश्चिम की तरफ मुंह किया जाये।
फायदे : पाखाना करते वक्त पूर्व या पश्चिम की तरफ मुह करने का खिताब मदीना वालों से है, क्योंकि उनका किब्ला दक्षिण की तरफ था, हिन्द और पाक में रहने वालों के लिए किब्ला पश्चिम की तरफ है, लिहाजा हमारे लिए दक्षिण और उत्तर की तरफ मुंह करने का हुक्म है।
*116 :- अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कुछ लोग कहते हैं कि जब तुम पाखाना के लिए बैठो तो न किब्ला की तरफ मुंह करो, न बैतुल मुकदस की तरफ, हालांकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पाखाना के लिए दो कच्ची ईटो पर बैतुल मुकददस की तरफ मुंह करके बैठे थे।
फायदे : एक रिवायत में है कि आप किब्ला की तरफ पीठ किये हुये बैठे थे। इमाम बुखारी का मानना है कि बैतुलखला में पाखाना के वक्त किब्ला की तरफ मुंह या पीठ करने की इजाजत है, यह पाबन्दी आबादी से बाहर करने वालों के लिए है।
*117 : आइशा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्ललाहु अलैहि वसल्लम की बीवियाँ रात को पाखाना के लिए मनासे की तरफ जाती थीं, जो एक खुली जगह थी। उमर रजि. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में आकर कहा करते थे कि आप अपनी बीवियों को पर्दे का हुक्म दे दें, लेकिन रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ऐसा न करते थे। एक रात इशा के वक्त सौदा बिन्ते जमआ रजि (पाखाना के लिए) बाहर निकली वो लम्बे कद वाली औरत थीं। उमर रजि. ने उन्हें पुकारा : आगाह रहो सौदा। हमने तुम्हें पहचान लिया है। इससे उमर की मर्जी यह थी कि पर्दे का हुक्म उतरे, आखिर अल्लाह तआला ने पर्दे की आयत नाजिल फरमा दी।
फायदे : मालूम हुआ कि जरूरी कामों के लिए औरत का पर्दे के साथ घर से बाहर निकलना जाइज है।
*118 : अनस रजि. से रिवायत, उन्होंने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब पाखाना के लिए निकलते तो मैं और एक दूसरा लड़का अपने साथ यानी का एक बर्तन लेकर जाते (आप उससे इस्तिंजा करते) ।
फायदे : सिर्फ ढेले का इस्तेमाल भी जाइज है,उससे सिर्फ हकीकी गंदगी दूर हो जाती है। अलबत्ता पानी के इस्तेमाल से गंदगी और उसके निशानात भी खत्म हो जाते हैं।
*119 : अनस रजि. ही की एक दूसरी रिवायत है कि पानी के बर्तन के साथ बरछी भी होती और आप हल जन पानी से इस्तिंजा फरमाते थे।
फायदे : बरछी इसलिए साथ ले जाते ताकि सख्त जगह को नरम करके पेशाब के छिन्टों से बचा जा सके और जरूरत के वक्त आड़ के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सके, और उसे बतौर सुत्ते के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था।
* 120 : कतादा रजि. से रिवायत है,उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब तुम में से कोई चीज पीये तो बर्तन में सांस न ले और जब बैतुलखला आये तो दायें हाथ से अपनी शर्मगाह (पेशाब की जगह) को न छूये और न उससे इस्तिंजा करे।
“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”
*101 :- अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मदीना के खण्डरों में चल रहा था और आप खुजूर की छड़ी के सहारे चल रहे थे। रास्ते में चन्द यहूदियों पर गुजर हुआ। उन्होंने आपस में कहा कि उनसे रूह के बारे में सवाल करो। उनमें से एक ने कहा कि हम ऐसा सवाल न करें कि जिसके जवाब में वह ऐसी बात कहें जो तुम्हे ना-गंवार गुजरे। बाज ने कहा: हम तो जरूर पूछेंगे। आखिर उनमें से एक आदमी खड़ा हुआ और कहने लगा, ऐ. अबू कासिम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! रूह क्या चीज हैं आप खामोश रहे, मैंने दिल में कहा कि आप पर वहय आ रही है और खुद खड़ा हो गया, जब वहय की हालत जाती रही तो आपने यह आयत तिलावत की “ ऐ पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! यह लोग आपसे रूह के मुताल्लिक पूछते हैं, कह दो कि रूह मेरे मालिक का हुक्म है। (और इसकी हकीकत यह नहीं जान सकते, क्योंकि) तुम्हें बहुत कम इल्म दिया गया है।
फायदे : इमाम आमश की किरअत में यह आयत गायब के सेगे से पढ़ी गई है जो शाज है। मुतावातिर किराअत खिताब के सेगे से है।
*102 :- अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि एक बार मुआज रजि. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सवारी पर पीछे बैठे थे। आपने फरमाया: ऐ मुआज रजि. उन्होंने अर्ज किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! खुशनसीबी के साथ हाजिर हूँ। फिर आपने फरमाया, ऐ मुआज रजि.! उन्होंने फिर अर्ज किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मैं हाजिर हूँ। तीन बार ऐसा हुआ, फिर आपने फरमाया, जो कोई सच्चे दिल से यह गवाही दे कि अल्लाह के अलावा हकीकत में कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके रसूल हैं। तो अल्लाह उस पर दोजख की आग हराम कर देता है। मुआज रजि. ने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलैहि वसल्लम! क्या मैं लोगों में इस बात को मशहूर न करूं ताकि वह खुश हो जायें। आपने फरमाया, ऐसा करेगा तो उनको इसी पर भरोसा हो जायेगा। फिर मुआज रजि. ने (अपनी वफात के करीब) यह हदीस गुनाह के डर से लोगों से बयान कर दी।
फायदे : कुछ वक्तों में मस्लेहत के मुताबिक काम करना करीन-ए-कयास होता है। जैसे नमाज जूते समेत पढ़ना सुन्नत है, लेकिन अगर किसी जगह लोग जाहिल हों और ऐसा काम करने से झगड़े और फसाद का डर हो तो ऐसी सुन्नत पर अमल करने को आईन्दा के लिए टाल देने में कोई हर्ज नहीं लेकिन हिकमत के तौर पर उन्हें उसकी फजीलल बताते रहना एक दावत देने वाले का अहम फर्ज है।
*103 :- उम्मे सलमा रजि. से रिवायत है कि उम्मे सुलैम रजि. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आयीं और मालूम किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला हक बात बयान करने से नहीं शरमाता, क्या औरत को एहतिलाम (वीर्य पतन) हो तो उसे नहाना चाहिए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, हाँ! अपने कपड़े पर पानी देखे। उम्मे सलमा रजि. ने (शर्म से)अपना मुंह छिपा लिया और अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! क्या औरत को भी एहतिलाम होता है? आपने फरमाया, हाँ, तेरा हाथ खाक आलूद हो, फिर बच्चे की सूरत माँ से क्यों मिलती?
फायदे : अगर किसी को कोई मसला पेश आ जाये तो उसे जानने वालों से मालूम करना चाहिए, शर्म और हया से काम न लिया जाये।
*104 :- अली रजि. से रिवायत है कि उन्होंने फ़रमाया कि मेरी मजी बहुत निकला करती थी, मैंने मिकदाद रजि. से कहा कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इसका हुक्म पूछें। चूनाचे उन्होंने मालूम किया तो आपने फरमाया कि मजी के लिए वजू करना चाहिए।
फायदे : दूसरी रिवायत में है कि हजरत अली रजि. खुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यह सवाल मालूम न कर सके, क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि यसल्लम की बेटी आपके निकाह में थी, इसलिए शर्म रोकती थी और ऐसी शर्म में कोई बुराई नहीं। कुछ रिवायतों से मालूम होता है कि हजरत अली रजि. की मौजूदगी में यह सवाल पूछा गया।
*105 :- अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से ‘रिवायत है कि एक आदमी मस्जिद में खड़ा हुआ और कहने लगा कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आप हमें एहराम बांधने का किस जगह से हुक्म देते हैं? आपने फरमाया: मदीना वाले जुल-हुलैफा से, शाम के लोग जोहफा से, और नज्द वाले कर्नध मनाजिल से एहराम बांधे । इब्ने रजि. ने कहा: लोग कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया कि यमन वाले य-लम-लम से एहराम बांधे लेकिन मुझे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यह बात याद नहीं है।
फायदे : मालूम हुआ कि मस्जिद में इल्मे दीन पढ़ना, पढ़ाना, फतव देना, मुकदमात का फैसला करना और दीनी बहस करना जाइज है। अगरचे आवाज ऊंची ही क्यों न हो जाये, क्योंकि यह सब दीनी काम हैं जो मस्जिद में अन्जाम दिये जा सकते हैं।
*106 :- अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से एक आदमी ने पूछा कि जो आदमी एहराम बांधे, वह क्या पहने? आपने फरमाया, न कुर्ता, न पगड़ी, न पाजामा, न टोपी और न वह कपड़ा जिसमें वर्स या जाफरान लगी हो और अगर जूती न हो तो मोजे पहन ले और उन्हें ऊपर से काट ले ताकि टखने खुल जायें ।
*107 :- अबू हुरैरा रजि, से रिवायत है, उन्हीं ने कहा: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “जिस आदमी का वुजू टूट जाये, उसकी नमाज कुबूल नहीं होती, जब तक वुजू न करे” एक हजरमी (हजरे मौत के रहने वाले एक आदमी) ने पूछा: “ऐ अबू हुरैरा! हदस (बे-वुजू होना) क्या है?” उन्होंने कहा: ”फुसा या जुरात यानी वह हवा जो पाखाना की जगह से निकलती हो।”
फायदे : इस हदीस से उस बहाने का भी रद्द होता है जिसकी वजह से यह बात की गई है कि आखरी तशहहुद में हवा निकलने का खतरा हो तो सलाम फेरने के बजाये अगर जानबूझ कर हवा खारिज कर दी जाये तो नमाज सही है, यह बात इसलिए गलत है कि नमाज सलाम से ही पूरी होती है और जोर से हवा निकालना किसी सूरत में भी सलाम का बदल नहीं हो सकता, इस किस्म की बहाने बाजी इस्लाम में नाजाइज और हराम है।
*108 :- अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते सुना है कि मेरी उम्मत के लोग कयामत के दिन बुलाये जायेंगे, जबकि वुजू के निशानों की वजह से उनके चेहरे और पांव चमकते होंगे। अब जो कोई तुममें से चमक बढ़ाना चाहे तो उसे बढ़ा लेना चाहिए।
*109 :- अब्दुल्लाह बिन यजीन अनसारी से रिवायत है, उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने एक आदमी का हाल बयान किया, जिसको यह ख्याल हो जाता था कि नमाज में वो कोई चीज (हवा का निकलना) महसूस कर रहा है, आपने फरमाया: वो नमाज से उस वक्त तक न फिरे जब तक हवा निकलने की आवाज या बू न पाये।
फायदे : मकसद यह है कि नमाजी को जब तक अपने बेवुजू होने का यकीन न हो जाये, नमाज को न छोड़े, इस हदीस से यह बात भी मालूम हुई कि कोई यकीनी मामला सिर्फ शक की वजह से मशकूक नहीं होता और किसी चीज को बिना वजह शक और शुबा की नजर से देखना जाइज नहीं।
*110 :- इन्ने अब्बास रजि. का बयान है कि एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सोये, यहां तक खर्रटे भरने लगे, फिर आपने (जागकर) नमाज पढ़ी और वुजू न किया, कभी रावी ने यूँ कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम करवट लेते, यहां तक कि सांस की आवाज आने लगी, फिर जागकर आपने नमाज पढ़ी ।
फायदे : दूसरी हदीस में हजरत इबने अब्बास रजि. का बयान है कि आपने नींद से उठकर पानी से भरे हुये एक पुराने मश्कीजे से हल्का सा वुजू किया, यानी वुजू के हिस्सों पर ज्यादा पानी नहीं डाला, या अपने वुजू के हिस्सों (अंगों) को सिर्फ एक एक बार
धोया।