बुखारी हदीस हिंदी Episode-10

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “

*91 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने मक्का से कत्ल या फील(हाथी) को रोक दिया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और ईमान वालों को इन (काफिरों) पर गालिब कर दिया, खबरदार मक्का मुझ से पहले किसी के लिए हलाल नहीं हुआ और ना मेरे बाद किसी के लिए हलाल होगा, खबरदार! यह मेरे लिए भी दिन में एक घड़ी के लिए हलाल हुआ था। खबरदार! यह इस वक्‍त भी हराम है। यहां के काटे न काटे जायें, न यहां के पेड़ काटे जायें। ऐलान करने वाले के सिवा वहां की गिरी हुई चीज कोई ना उठाये और जिस का कोई अजीज मारा जाये, उसको दो में से एक का इख्तयार है। दण्ड कबूल कर ले या बदला ले ले, इतने में एक यमनी आदमी आया और उसने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलैहि वसल्लम! यह बातें मुझे लिख दीजिए। आपने फरमाया, अच्छा अबू फुलां को लिख दो। कुरैश के एक आदमी ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मगर इजखिर (खुशबूदार घास) के काटने की इजाजत दे दीजिये, इसलिए कि हम इसे अपने घरों और कब्रों में इस्तेमाल करते हैं। तो आपने हाँ काट सकते हो ।

*92 : इब्ने अब्बास रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बहुत बीमार हो गये तो आपने फरमाया कि लिखने का सामान लाओ ताकि मैं तुम्हारे लिए एक तहरीर लिख दूं। जिसके बाद तुम गुमराह नहीं होगे। उमर रजि. ने कहा कि नबी.” “की सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर बीमारी का गल्वा है और हमारे पास अल्लाह की किताब मौजूद है, वह हमें काफी है, लोगों ने इख्तिलाफ शुरू कर दिया और शौर मच गया, तब आपने फरमाया: मेरे पास से उठ जाओ, मेरे यहां लड़ाई झगड़े का कया काम है?

फायदे : हजरत उमर रजि. का मकसद आपके हुक्म की खिलाफवर्जी करना मकसूद न था, बल्कि आपने ऐसा मुहब्बत की खातिर फरमाया, वरना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसके बाद चार रोज तक जिन्दा रहे और दूसरे अहकाम नाफिज फरमाते रहे, जबकि तहरीर के बारे में आपने खामोशी इख्तियार फरमायी। मालूम हुआ कि हजरत उमर रजि. की राय से आपको इत्तिफाक था याद रहे कि लिखने का सामान लाने का यह हुक्म आपने हजरत अली रजि. को दिया था।

*93 : उम्मे सलमा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक रात जागे तो फरमाया: सुब्हान अल्लाह! आज रात कितने फितने नाजिल किये गये, और कितने खजाने खोले गये। इन कमरों में सोने वालियों को जगावो क्योंकि दुनिया में बहुत सी कपड़े पहनने वालियां ऐसी हैं जो आखिरत में नंगी होंगी।

*94 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी आखरी उम्र में हमें इशा की नमाज पढ़ाई, जब सलाम के बाद खड़े हो गये तो फरमाया तुम इस रात की अहमियत को जानते हो, आज की रात से सौ बरस बाद कोई आदमी जो अब जमीन पर मौजूद है जिन्दा नहीं रहेगा।

फायदे : इस हदीस से यह भी मालूम होता है कि हजरत खिज़्र अलैहि अब जिन्दा नहीं हैं, क्योंकि इस हदीस के मुताबिक सौ साल बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखने वाला कोई भी जिन्दा नहीं रहा, लेकिन नवाब सिद्दीक हसन रह. को इस से इतेफाक नही ।

*95 : अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैंने एक रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी मैमूना बिन्ते हारिस रजि. के यहां गुजारी। इस रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी इन्हीं के पास थे। आपने इशा मस्जिद में अदा की, फिर अपने घर तशरीफ लाये और चार रकअर्तें पढ़ कर सो गये, फिर जागे और ‘फरमाया, क्या बच्चा सो गया है? या कुछ ऐसा ही फरमाया और फिर नमाज पढ़ने लगे, मैं भी आपके बायीं तरफ खड़ा हो गया, आपने मुझे अपनी दायीं तरफ कर लिया और पांच रकाअतें पढ़ी, उसके बाद दो रकाअत (सुन्नते फजर) अदा कीं, फिर सो गये, यहां तक कि मैंने आपके खर्राटे भरने की आवाज सुनी, फिर (सुबह की) नमाज के लिए बाहर तशरीफ ले गये।

फायदे : यह आपकी खासियत थी कि सोने से आपका यजू नहीं टूटता था, क्योंकि हदीस में है कि रसूलुल्लाह की आंखें सोती हैं, दिल नहीं सोता।

*96 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है,उन्होंने फरमाया, लोग कहते हैं अबू हुरैरा रजि. ने बहुत हदीसें बयान की हैं, हालांकि अगर किताबुल्लाह में दो आयतें न होतीं तो मैं भी हदीस बयान न करता,फिर उन्होंने उन आयतों की तिलावत की। “जो लोग छुपाते हैं, उन खुली हुई निशानियों और हिदायत की बातों को जो हमने नाजिल कीं । अर्रहीम’ तक बेशक हमारे मुहाजिर भाई बाजार में बेचने व खरीदने में मशगूल रहते थे और हमारे अन्सारी भाई माल और खेती-बाड़ी के काम में लगे रहते थे, लेकिन अबू हुरैरा रजि. तो अपना पेट भरने के लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास मौजूद रहता था और ऐसे मौके पर हाजिर रहता, जहां लोग हाजिर न रहते और वह बातें याद कर लेता जो दूसरे लोग नहीं याद कर सकते थे। अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि उन्होंने फरमाया, मैंने अर्ज किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मैं आपसे बहुत सी हदीसें सुनता हूँ, लेकिन भूल जाता हूँ। आपने फरमाया: अपनी चादर बिछाओ। चूनौंचे मैंने चादर विछाई तो आपने अपने दोनों हाथों से चुल्लू सा बनाया और चादर में डाल दिया, फिर फरमाया कि इसे अपने ऊपर लपेट लो। मैंने उसे लपेट लिया, उसके बाद मैं कोई चीज न भूला।

फासदे : यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का मोजजा (करिश्मा) था कि हजरत अबू हुरैरा रजि. से भूल को खत्म कर दिया गया, जो इन्सान को लाजिम है।

*97 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया : मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से (इल्म के) दो जरफ याद किये, इनमें से एक तो मैंने जाहिर कर दिया और दूसरे को भी जाहिर कर दूं तो मेरा यह गला काट दिया जाये।

फायदे : दूसरे जरफ का ताल्लुक बुरे हाकिमों से था। चूनांचे कुछ रिवायतों में इस का बयान है।

*98 : जरीर बिन अब्दुल्लाह रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आखरी हज के मौके पर उन से फरमागा: लोगों को खामोश कराओ, उसके बाद आपने फरमाया, ऐ लोगो! मेरे बाद एक दूसरे की गर्दने मारकर काफिर न बन जाना।

फायदे : इससे मुराद कुफ़े हकीकी नहीं, बल्कि काफिरों का सा काम मुराद है, वरना मुसलमान को कत्ल करने वाला काफिर नहीं होता, हां! अगर इस कत्ल को हलाल समझता है तो ऐसा इन्सान इस्लाम के दायरे से खारिज है।

*99 : उबय्यि-बिन-क-अ-ब रजि. से रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: मूसा अलैहि. एक दिन बनी इस्राईल को समझाने के लिए खड़े हुये तो उनसे पूछा गया कि लोगों में सबसे बड़ा आलिम कौन हैं? उन्होंने कहा: मैं हूँ, अल्लाह ने उन पर नाराजगी जताई, क्योंकि उन्होंने इल्म को अल्लाह के हवाले न किया, फिर अल्लाह ने उन पर वहय भेजी कि मेरे बन्दों में एक बन्दा जहां दो दरिया मिलते हैं, ऐसा है जो तुझ से ज्यादा इल्म रखता है। मूसा अलैहि. ने कहा: ऐ अल्लाह मेरी उनसे कैसे मुलाकात होगी? हुक्म हुआ कि एक मछली को थैले में रखों। जहां वह गुम हो जाये, वहीं उसका ठिकाना है। फिर मूसा अलैहि. रवाना हुये और उनका नौकर यूशा बिन नून भी साथ था उन दोनों ने एक मछली को थैले में रख लिया। जब एक पत्थर के पास पहुंचे तो दोनों अपने सर उस पर रखकर सो गये, इस दौरान मछली थैले से निकल कर दरिया में चली गई, जिससे मूसा अलैहि. और उनके नौकर को अचम्भा हुआ। फिर दोनों बाकी रात और एक दिन चलते रहे, सुबह को मूसा अलैहि. ने अपने नौकर से कहा कि नाश्ता लाओ हम तो इस सफर से थक गये हैं। मूसा अलैहि. जब तक उस जगह से आगे नहीं निकल गये, जिसका उन्हें हुक्म दिया गया था, उस वक्‍त तक उन्होंने कुछ थकावट महसूस न की। उस वक्‍त उनके नौकर ने कहा: क्या आपने देखा कि जब हम पत्थर के पास बैठे थे तो मछली (निकल भागी थी और मैं उसका जिक्र करना) भूल गया। मूसा अलेहि ने कहा, हम इसी की तलाश में थे। आखिर वह दोनों खोज लगाते हुये अपने पैरों के निशानों पर वापिस लौटे। जब उस पत्थर के पास पहुंचे तो देखा कि एक आदमी कपड़ा लपेटे हुये या अपने कपड़ों में लिपटा हुआ है। मूसा अलैहिं. ने उसे सलाम किया खिज़्र अलैहिस्सलाम ने कहा कि तेरे मुल्क में सलाम कहां से आया? मूसा अलैहि. ने जवाब दिया कि (मैं यहां का रहने वाला नहीं हूँ बल्कि) मैं मूसा हूँ। खिज़्र अलैहि. ने कहा, क्या बनी इस्राईल के मूसा हो? उन्होंने कहा! हाँ! फिर मूसा अलैहि. ने कहा, क्या मैं इस उम्मीद पर तुम्हारे साथ हो जाऊँ कि जो कुछ हिदायत की तुम्हें तालीम दी गई है, वह मुझे भी सिखा दोगे। खिज़र सफदर अलैहि ने कहा: तुम मेरे साथ रह कर सब्र नहीं कर सकोगे मूसा बात दरअसल यह है कि अल्लाह तआला ने एक (किस्म का) इल्म मुझे दिया है जो तुम्हारे पास नहीं है और आपको एक किस्म का इल्म दिया जो मेरे पास नहीं है। मूसा अलैहि. ने कहा: इन्शा अल्लाह तुम मुझे सब्र करने वाला पाओगे और मैं किसी काम में आपकी नाफरमानी नहीं करूंगा। फिर वह दोनों समन्दर के किनारे चले। उनके पास कोई कश्ती ना थी। इतने में एक कश्ती गुजरी, उन्होंने कश्ती वाले से कहा कि हमें सवार कर लो। खिज़्र अलैहि. पहचान लिये गये। इसलिए कश्ती वाले ने बगैर किराया लिये बिठा लिया, इतने में एक चिड़िया आयी और कश्ती के किनारे बैठ गई, उसने समन्दर में एक दो चोंच मारीं। खिज़र कहने लगे : ऐ मूसा मेरे और तुम्हारे इल्म ने अल्लाह के इल्म से सिफ॑ चिड़िया की चोंच की मिकदार हिस्सा लिया है। फिर खिज़्र अलेहि. ने कश्ती के तख्तों में से एक तख्ता उखाड़ डाला। मूसा अलहि, कहने लगे, इन लोगों ने तो हमें बगैर किराये के सवार किया और आपने यह काम किया कि इनकी कश्ती में छेद कर डाला ताकि कश्ती वालों को डूबा दो? खिज़्र अलैहि. ने फरमाया: क्या मैंने न कहा था कि तुम मेरे साथ रहकर सब्र नहीं कर सकोगे। मूसा अलैहि. ने जवाब दिया: मेरी भूल चूक पर पकड़ करके मेरे कामों में मुझ पर तंगी ना करो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मूसा अलैहि. का पहला एतराज भूल की वजह से था। फिर दोनों (कश्ती से उतरकर) चले। एक लड़का मिला जो दूसरे लड़कों के साथ खेल रहा था। खिज़र अलैहि. ने उसका सर पकड़कर अलग कर दिया। मूसा अलैहि. ने कहा: आपने एक मासूम जान को नाहक कत्ल कर दिया खिज़्र अलैहि. ने कहा: मैंने आपसे नहीं कहा था कि आपसे मेरे साथ सब्र नहीं हो सकेगा। (इबने उऐना कहते हैं कि पहले जवाब के मुकाबिल इसमें ज्यादा ताकीद थी।) फिर दोनों चलते चलते एक गांव के पास पहुंचे। वहां के रहने वालों से उन्होंने खाना मांगा। गांव वालों ने उनकी मेहमानी करने से साफ इनकार कर दिया। इसी दौरान दोनों ने एक दीवार देखी जो गिरने के करीब थी, खिज़र अलैहि. ने उसे अपने हाथ से सहारा देकर सीधा कर दिया मूसा अलैहि. ने कहा, अगर तुम चाहते तो इस पर मजदूरी ले लेते, खिज़र अलैहि, बोले, बस यहां से, हमारे तुम्हारे बीच जुदाई का वक्‍त आ पहुंचा है रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, अल्लाह तआला मूसा अलैहि. पर रहमफरमाये। हम चाहते थे कि काश मूसा अलैहि. सब्र करते तो उनके मजीद हालात हमसे बयान किये जाते।

फायदे : हजरत खिज़्र अलैहि. हजरत मूसा अलैहि. से अफजल न थे, लेकिन आपका यह कहना कि मैं सब से ज्यादा इल्म रखता हूँ, अल्लाह तआला को पसन्द न आया। उन्हें चाहिए था कि इस बात को अल्लाह के हवाले कर देते। चूनांचे उनका मुकाबला ऐसे इन्सान से कराया गया जो उनसे दर्जे में कहीं कम था, ताकि फिर कभी इस किस्म का दावा ना करें।

*100 : अबू मूसा रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में एक आदमी आया और पूछने लगा ऐ अल्लाह के रसूल | कि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम!अल्लाह की राह में लड़ना किसे कहते हैं? क्योंकि हममें से कोई गुस्सा की वजह से लड़ता है और कोई इज्जत की खातिर जंग करता हैं आपने फरमाया:आदमी इसलिए लड़े कि अल्लाह का बोल-बाला हो तो ऐसी लड़ाई
अल्लाह की राह में है।

फायदे : मतलब यह है कि अगर शागिर्द खड़ा हो और उस्ताद बैठे बैठे उसको जवाब दे दे तो इसमें कोई बुराई नहीं, बशर्ते कि खुद पसन्दी और घमण्ड की बिना पर ऐसा न करें। इसी तरह खड़े खड़े सवाल करना भी ठीक हैं। और यहां सवाल खड़े खड़े किया गया था।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-9

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*81 : अबू मूसा अशअरी रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: तीन आदमी ऐसे हैं, जिनको दोगुना सवाब मिलेगा। एक वह आदमी जो अहले किताब में से अपने नवी पर और फिर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाये और दूसरे वह गुलाम जो अल्लाह और अपने मालिकों का हक अदा करता रहे और तीसरा वह जिसके पास उसकी लौण्डी हो, जिससे ताल्लुकात कायम करता हो, फिर उसे अच्छी तरह तालीम और अदब सिखा कर आजाद कर दे उसके बाद उससे निकाह कर ले तो उसको दोहरा सवाब मिलेगा।

*82 : इबने अब्बास रजि. से रिवायत है की उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्‍लाहु अलैहि वसल्लम (ईद के दिन मर्दों की सफ से औरतों की तरफ) निकले और आपके साथ बिलाल रजि. थे। आपको ख्याल हुआ कि शायद औरतों तक मेरी आवाज नहीं पहुंची, इसलिए आपने उनको नसीहत फरमायी और सदका व खैरात देने का हुक्म दिया तो कोई औरत अपनी बाली और अंगूठी डालने लगी और बिलाल रजि. (उन जेवरात को) अपने कपड़े में जमा करने लगे। फायदे : मालूम हुआ कि सदका व खैरात के लिए शौर्क दिलाना और सिफारिश करना बड़े सवाब का काम है। औरतों को अपनी अंगूठी, छल्‍ला, हार, गलूबन्द, और बालियां पहनना जाइज है।

*83 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है, फरमाते हैं कि मैंने अर्ज किया ऐ रसूलुल्लाह! कयामत के दिन आपकी सिफारिश से कौन ज्यादा हिस्सा पायेगा तो आपने फरमाया: अबू हुरैरा! मेरा ख्याल था कि तुमसे पहले कोई मुझ से यह बात नहीं पूछेगा, क्योंकि मैं देखता हूँ कि तुझे हदीस का बहुत हिस्र है। कयामत के दिन मेरी शिफाअत से सबसे ज्यादा खुश किस्मत वह आदमी होगा, जिसने अपने दिल या साफ नियत से “ला इलाहा कहा हो। फायदे : दिल से कलमा-ए-इख्लास कहने का मत्तलब यह है कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करें, क्योंकि जो आदमी शिर्क करता है, उसका सिर्फ जुबानी दावा है, दिल से उसका इकरार नहीं करता।

*84 : अब्दुल्लाह बिन अम्न बिन आस रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा, मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वबसल्लम को यह फरमाते हुये सुना कि अल्लाह तआला इल्मे दीन को ऐसे नहीं उठायेगा कि बन्दों के सीनों से निकाल ले, बल्कि अहले इल्म को मौत देकर इल्म को उठायेगा। जब कोई आलिम बाकी नहीं रहेगा तो लोग जाहिलों को सरदार बना लेंगे और उनसे मसायल पूछें जायेंगे। तो वह बगैर इल्म के फतवे देकर खुद भी गुमराह होंगे और दूसरों को भी गुमराह करेंगे। फायदे : इस से यह भी मालूम हुआ कि दीनी मामलात में फुजूल राय कायम करना और बिना वजह कयास करना मजम्मत के लायक है।

*85 : अबू सईद खुदरी रजि. से रिवायत है कि चन्द औरतों ने नबी ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज किया कि मर्द आप से फायदा उठाने में हमसे आगे बढ़ गये हैं। इसलिए आप अपनी तरफ से हमारे लिए कोई दिन मुकर्रर फरमां दें । आपने उनकी मुलाकात के लिए एक दिन का वादा कर लिया, चूनांचे उस दिन आपने नसीहत फरमायी और शरीअत के अहकाम बताये। आपने उन्हें जिन बातों की तलकीन फरमायी, उनमें एक यह भी थी कि तुममें से जो औरत अपने तीन बच्चे आगे भेज देगी तो वह उसके लिए दोजख की आग से पर्दा बन जायेंगे। एक औरत ने अर्ज किया अगर कोई दो भेजे तो? आपने फरमाया कि दो का भी यही हुक्म है और अबू हुरैरा रजि. की रिवायत में यह ज्यादा है कि वह तीन बच्चे जो गुनाह की उम्न यानी जवानी तक न पहुंचे हों ।

फायदे : मतलब यह है कि अगर किसी औरत के तीन बच्चे मर जायें और वह सब्र से काम ले तो यह बच्चे कयामत के दिन जहन्नम से ओट बन जायेंगे दूसरी रिवायत में है कि एक बच्चा बल्कि कच्चा बच्चा भी जहननम से रूकावट का सबब है।

*86 : आइशा रजि.से रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ‘“कयामत के दिन जिसका हिसाब हो, उसे अजाब दिया जायेगा। इस पर आइशा रजि ने अर्ज किया कि अल्लाह तआला तो फरमाता है, उसका हिसाब आसानी से लिया जायेगा। आपने फरमाया (यह हिसाब नहीं है) बल्कि इससे मुराद आमाल की पेशी है, लेकिन जिससे हिसाब में जांच पड़ताल की गई वह जरूर तबाह हो जायेगा।

फायदे : मालूम हुआ कि अगर दीनी मसले में किसी को शक हो तो सवाल के जरीये उसका हल तलाश करना चाहिए।

*87 : अबू शुरैह रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से फतह मक्का के दिन एक ऐसी बात महफूज की, जिसे मेरे कानों ने सुना, दिल ने उसे याद रखा और मेरी दोनों आंखों ने आपको देखा, जब आपने यह हदीस बयान फरमायी। आपने अल्लाह की बड़ाई बयान करने के बाद फरमाया कि मक्का (में लड़ाई और झगड़ा करना) अल्लाह ने हराम किया है, लोगों ने हराम नहीं किया, लिहाजा अगर कोई आदमी अल्लाह और आखिरत पर ईमान रखता हो तो उसके लिए जाइज नहीं कि मक्का में मार काट करे या वहां से कोई पेड़ काटे। अगर कोई आदमी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के किताल (लड़ाई करने) से झगड़े को जाइज करार दे तो उससे कह देना कि अल्लाह ने अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को तो इजाजत दी थी, लेकिन तुम्हें नहीं दी, और मुझे भी दिन में कुछ वक्‍त के लिए इजाजत थी और आज इसकी इज्जत फिर वैसी ही हो गई, जैसे कल थी। जो आदमी यहां हाजिर है, उसे चाहिए कि गायब को यह खबर पहुंचा दे।

*88 : अली रजि, से रिवायत है, कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना, आप फरमा रहे थे “(देखो) कि मुझ पर झूट न बांधना, क्योंकि (जो आदमी मुझ पर झूट बांघेगा वह जरूर दोजख में जायेगा।’”

फायदे : यह वादा हर तरह के झूट को शामिल है जो लोग तरगीब और तरहीब के बारे में बे-असल हदीसें बयान करते हैं, वह इसी दायरे में आते हैं।

*89 : सलमा बिन अकवा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुये सुना है कि जो आदमी मुझ पर वह बात लगाये जो मैंने नहीं कही तो वह अपना ठिकाना आग में बना ले।

*90 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, कि मेरे नाम (मुहम्मद और अहमद) पर नाम रखो, मगर मेरी कुन्नियत (अबुलकासिम) पर न रखो और यकीन करो, जिसने मुझे ख्याब में देखा, उसने यकीनन मुझ को देखा है, क्योंकि शैतान मेरी सूरत में नहीं आ सकता और जो जानबूझ कर मुझ पर झूट बांधे वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।

फायदे : ख्वाब में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखने की खुशनसीबी ऐसी सूरत में बरकत का सबब है, जबकि ख्वाब में देखा हुआ हुलिया हदीस की किताबों में मौअूद आपकी हुलिये मुबारक के मुताबिक हो। आपके हुलिये मुबारक के मुताल्लिक मुस्तनद किताब ““अर्रसूलो क-अननका तराहो’” बहुत फायदेमन्द है, जिसका उर्दू तर्जुमा आईन-ए-जगाले नवूवत” के नाम से मकतब दारूस्सलाम ने जारी किया है।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-8

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*71 :- इबने उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह अलैहि वसल्लम से सुना, आप फरमा रहे थे कि मैं एक बार सो रहा था, मेरे सामने दूध का प्याला लाया गया। मैंने उसे पी लिया, यहा तक कि सैराबी मेरे नाखूनों से जाहिर होने लगी, फिर मैंने अपना बचा हुआ दूध उमर विन खत्ताब रजि. को दे दिया। सहाबा किराम रजि, ने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल! आपने इसकी क्या ताबीर की? आपने फरमाया कि इसकी ताबीर “’इल्म”’ है।
फायदे : मालूम हुआ कि ख्वाब में दूध पीने की ताबीर इल्म का हासिल करना है, नीज अगर दूध की सैराबी को नाखूनों में देखे तो उससे इल्म की सैराबी और फरावानी (ज्यादती) मुराद ली जा सकती है।

*72 :- अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने आखरी हज के वक्‍त मिना में उन लोगों के लिए खड़े थे जो आपसे सवाल पूछ रहे थे। एक आदमी आया और कहने लगा, मुझे ख्याल नहीं रहा, मैंने कुरबानी से पहले अपना सर मुंडवा लिया है। आपने फरमाया: अब कुर्बानी कर लो, कोई हर्ज नहीं। फिर एक आदमी आया और अर्ज किया, इल्म न होने से मैंने कंकरियां मारने से पहले कुरबानी कर ली। आपने फरमाया : अब रमी कर लो, कोई हर्ज नहीं। अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि. कहते हैं कि उस दिन आप से जिस बात के बारे में पूछा गया, जो किसी ने पहले कर ली या बाद में तो आपने फरमाया: अब कर लो कुछ हर्ज नहीं।

*73 :- अबू हुरैरा रजि. नवी सल्लल्लाहु अलैहिं वसल्लम से बयान करते हैं कि आपने फरमाया: आने वाले जमाने में इल्म उठा लिया जायेगा, जिहालत और फितने गालिब होंगे और हर्ज ज्यादा होगा।” अर्ज किया गया : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! हर्ज क्या चीज हैं? आपने अपने हाथ मुबारक से इस तरह तिरछा इशारा करके फरमाया, जैसे कि आपकी मुराद कत्ल थी।

*74 :- असमा बिन्‍ते अबू बकर रजि. से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि मैं आइशा रजि, के पास आयी, वह नमाज पढ़ रही थी। मैंने कहा, लोगों का क्या हाल है, यानी वह परेशान क्यों हैं? उन्होंने आसमान की तरफ इशारा किया, यानी देखो सूरज ग्रहण लगा हुआ है, इतने में लोग सूरज ग्रहण की नमाज के लिए खड़े हुये तो आइशा रजि. ने कहा: सुब्हानअल्लाह! मैंने पूछा (यह ग्रहण) क्या कोई (अजाब या कयामत की) निशानी है? उन्होंने सर से इशारा किया कि हाँ, फिर मैं भी (नमाज के लिए) खड़ी हो गई, यहां तक कि मैं बेहोश होने लगी तो
*
मैंने अपने सर पर पानी डालना शुरू कर दिया (जब नमाज खत्म हो चुकी तो) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह तआला की तारीफ बयान की और फरमाया: “जो चीजें अब तक मुझे ना दिखाई गई थी, उनको मैंने अपनी इस जगह से देख लिया है, यहां तक कि जन्नत और दोजख को भी, और मेरी तरफ यह वह्‌य भेजी गई कि कब्रों में तुम्हारी आजमाइश होगी, जैसे मसीहे दज्जाल या इसके करीब करीब फितने से आजमाये जाओगे (रावी कहता है, मुझे याद नहीं कि हजरत असमा ने कौनसा लफ्ज कहा था) और कहा जायेगा कि तुझे उस आदमी यानी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में क्या अकीदा है?

ईमानदार या यकीन रखने वाला । कहेगा कि हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं जो हमारे पास खुली निशानियां और हिदायत लेकर आये थे, हमने उनका कहा माना और उनकी पैरवी की, यह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं, तीन बार ऐसा ही कहेगा, चूनांचे उससे कहा जायेगा, तू मजे से सो जा, बेशक हमने जान लिया कि तू मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान रखता है और मुनाफिक या शक करने वाला कहेगा कि मैं कुछ नहीं जानता, हाँ लोगों को जो कहते सुना, में भी वहीं कहने लगा।”

फायदे : इस हदीस से कब्र के अजाब और उसमें फरिश्तों का सवाल करना साबित होता है, नीज जो इन्सान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत पर शक करता है, वह इस्लाम के दायरे से निकल जाता है और यह भी मालूम हुआ कि हल्की
बेहोशी पड़ने से वुजू नहीं टूटता ।

*75 : उकबा बिन हारिस रजि. से रिवायत है कि उन्होंने अबू इहाब बिन अजीज की बेटी से निकाह किया। फिर एक औरत आयी और कहने लगी कि मैंने उक्बा और उसकी बीवी को दूध पिलाया है। उकबा ने कहा कि मुझे तो इल्म नहीं है कि तूने मुझे दूध पिलाया है और न पहले तुमने इसकी खबर दी, फिर उक्बा सवार होकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास मदीना मुनव्वरा आ गये और आपने मसअला पूछा तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “(तू उस औरत से) कैसे (मिलेगा) जब कि ऐसी बात कही गई है, आखिर उक्बा रजि, ने उस औरत को छोड़
दिया और उसने किसी दूसरे आदमी से शादी कर ली।
फायदे : इस हदीस से उन शकों की तफ्सीर होती है, जिनसे बचने को कहा गया है।

*76 : उमर बिन खत्ताब रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं और मेरा एक अन्सारी पड़ोसी बनू उम्मया बिन जैद के गांव में रहा करते थे जो मदीने की बुलन्दी की तरफ था, और हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में बारी बारी आते थे। एक दिन वह आता और एक दिन मैं। जिस दिन मैं आता था, उस रोज की वहय वगैरह का हाल मैं उसको बता देता था और जिस
दिन वह आता, वह भी ऐसा ही किया करता था। एक दिन ऐसा हुआ कि मेरा अन्सारी दोस्त जब वापस आया तो उसने मेरे दरवाजे पर जोर से दस्तक दी और कहने लगा कि वह (उमर) यहां है मैं घबराकर बाहर निकल आया तो बह बोला: आज एक बहुत बड़ा हादसा हुआ।

(रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी बीवियों को तलाक दे दी है) उमर रजि. कहते हैं कि मैं हफ्सा रजि. के पास गया तो वह रो रही थीं। मैंने कहा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तुम्हें तलाक दे दी है? वह बोलीं, मुझे इलम नहीं है। फिर मैं नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास हाजिर हुआ और खड़े खड़े अर्ज किया कि क्या आपने अपनी बीवियों को तलाक दे दी हैं? आपने फरमाया, “’नहीं” तो मैंने (मारे खुशी के) अल्लाहु अकबर कहा।
फायदे : मालूम हुआ कि अगर पड़ोसियों को तकलीफ ना हो तो छत पर बालाखाना बनाने में कोई हर्ज नहीं । नीज़ बाप को चाहिए कि वह अपनी बेटी को शौहर की इंताअत और फरमांबरदारी के बारे में नसीहत करता रहे।

*77 : अबू मसऊद अन्सारी रजि. से रिवायत है उन्होंने फरमाया कि एक आदमी ने, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मेरे ही लिए नमाज जमाअत से पढ़ना मुश्किल हो गया है, क्योंकि फलां आदमी नमाज बहुत लम्बी पढ़ाते हैं। अबू मसऊद अन्सारी रजि. कहते हैं कि मैंने नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नसीहत के वक्‍त उस दिन से ज्यादा कभी गुस्से में नहीं देखा। आपने फरमाया, लोगो! तुम दीन से नफरत दिलाने वाले हो।
*
देखो जो कोई लोगों को नमाज पढ़ाये उसे चाहिए कि हल्की नमाज पढ़ाये, क्योंकि पीछे नमाज पढ़ने वालों में बीमार, कमजोर और जरूरतमन्द भी होते हैं।
फायदे : मालूम हुआ कि मस्जिद के इमामों को अपने पीछे नमाज पढ़ने वालों का ख्याल रखना चाहिए, नीज गुस्सा की हालत में फैसला या फतवा देना, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खुसूसियत है, दूसरों को इसकी इजाजत नहीं। मगर यह कि इन्सान पर गुस्से का असर न हो।

*78 : जैद बिन खालिद जुहनी रजि, से रिवायत है कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम से गिरी हुई चीज के बारे में पूछा गया तो आपने फरमाया: “उसके बन्धन या बरतन और थैली की पहचान रख और एक साल तक (लोगों में) उसका ऐलान करता रह,फिर उससे फायदा उठा, इस दौरान अगर उसका मालिक आ जाये तो उसके हवाले कर दे।”” फिर उस आदमी ने पूछा कि गुमशुदा ऊंट का क्या हुक्म है? यह सुनकर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस कदर गुस्सा हुये कि आपका चेहरा सुर्ख हो गया (रावी को शक है) और फरमाया कि तुझे ऊंट से क्या गर्ज है?

उसकी मश्क और उसका मोजा उसके साथ है, जब पानी पर पहुंचेगा, पानी पी लेगा और पेड़ से चरेगा, उसे छोड़ दे, यहां तक कि उसका मालिक उसको पा ले। फिर उस आदमी ने कहा, अच्छा गुमशुदा बकरी? आपने फरमाया: “वह तुम्हारी या तुम्हारे भाई (असल मालिक) या भेड़िये की है।”

फ़ायदे : आजकल किसी आबादी में आवारा ऊंट मिले तो उसे पकड़ लेना चाहिए ताकि मुसलमान का माल महफूज रहे और किसी बुरे आदमी की भेंट न चढ़े।

*79 : अबू मूसा अशअरी रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से चन्द ऐसी बातें पूछी गयीं जो आपके मिजाज के खिलाफ थीं। जब इस किस्म के सवालात की आपके सामने तकरीर की गई तो आपको गुस्सा आ गया और फरमाया, अच्छा जो चाहो, मुझ से पूछो। उस पर एक आदमी ने अर्ज किया, मेरा बाप कौन है? आपने फरमाया, तेरा बाप हुजाफा है, फिर दूसरे आदमी ने खड़े होकर कहा, या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरा बाप कौन है? आपने फरमाया, तेरा बाप सालिम हैं, जो शैबा का गुलाम है। फिर जब उमर रजि. ने आपके चेहरे पर गजब के निशान देखे तो कहने लगे ऐ रसूलुल्लाह ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! हम अल्लाह तआला की बारगाह में तौबा करते है।।
फायदे : मालूम हुआ कि ज्यादा सवालात के लिए तकलीफ उठाना नापसन्दीदा अमल है।

*80 : अनस रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब कोई अहम बात फरमाते तो उसे तीन बार दोहराते, यहां तक कि उसे अच्छी तरह समझ लिया जाये और जब किसी कौम के पास तशरीफ ले जाते तो उन्हें तीन बार सलाम भी फरमाते थे।

फायदे : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का खास वक्त में तीन बार सलाम करने का अमल था, जैसे किसी के घर में आने की इजाजत तलब करते वक्‍त ऐसा होता था या एक बार सलाम, इजाजत के लिए, दूसरा जब उनके पास जाते और तीसरा जब उनके पास से वापस होते। आम हालात में तीन बार सलाम करना आपके अमल से साबित नहीं।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-7

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

61 : अबू बकर रजि. से रिवायत है कि एक दफा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने ऊंट पर बैठे हुये थे और एक आदमी उसकी नकेल या मुहार थामे हुये था। आपने फरमाया यह कौन सा दिन हैं? लोग इस ख्याल से खामौश रहे कि शायद आप उसके असल नाम के अलावा कोई और नाम बतायेंगे। आपने फरमाया: क्या यह कुरबानी का दिन नहीं हैं? हमने अर्ज किया क्यों नहीं! फिर आपने फरमाया यह कौन सा महीना हैं? हम फिर इस ख्याल से चुप रहे कि शायद आप उसका
कोई और नाम रखेंगे। आपने फरमाया, क्‍या यह जिलहिज्जा का महीना नहीं है? हमने कहा, क्यों नहीं! तब आपने फरमाया: “तुम्हारे खून, तुम्हारे माल और तुम्हारी इज्जतें एक दूसरे पर इस तरह हराम हैं जिस तरह कि तुम्हारे यहां इस शहर और इस महीने में इस दिन की हुरमत है। चाहिए कि जो आदमी यहां हाजिर है, वह गायब को यह खबर पहुंचा दे, इसलिए कि शायद हाजिर ऐसे आदमी को खबर दे जो इस बात को उससे ज्यादा याद रखे।”

कायदे : तकरीर की महफिल में हाजिर रहने वाले को चाहिए कि वह इल्म और दीन की बातें गैर मौजूद लोगों तक पहुंचाये।

62:इबने मसऊद रजि. से रिवायत है कि उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम हमारे (उकता जाने) के डर से हमें तकरीर व नसीहत करने के लिए वक्‍त और मौका महल का ख्याल रखते थे।
फायदे : मालूम हुआ कि तकरीर करने वालों को तकरीर और नसीहत के वक्‍त मौका और जगह का खयाल रखना चाहिए ताकि लोग उकता न जायें और न ही उनमें नफरत का जोश पैदा हो।

63 : अनस रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “(दीन में) आसानी करो, सख्ती न करो और लोगों को खुशखबरी सुनाओ, उन्हें (डरा डराकर) नफरत करने वाला न
बनाओ।

फायदे : मालूम हुआ कि दीनी मामलात में बहुत ज्यादा सख्ती नही करनी चाहिए।

*64 :- अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्‍लाहु अलैहि वसल्लम के पास (बैठे हुये) थे कि आपके पास खजूर का गूदा लाया गया। आपने फरमाया, पेड़ों
में से एक पेड़ है यह हदीस पहले गुजर चुकी है। इस रिवायत में उन्होंने यह इजाफा बयान किया “मैंने अपने आपको देखा कि मैं ही सबसे छोटा हूँ लिहाजा खामोश रहा।

*65 :- अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है, रश्क जाइज नहीं मगर दो (आदमियों की) आदतों पर एक उस आदमी (की आदत) पर जिसको अल्लाह ने माल दिया हो, वह उसे हक के रास्ते में नेक कामों पर खर्च करे और दूसरे उस आदमी (की आदत) पर जिसे अल्लाह ने (कुरआन और हदीस का) इल्म दे रखा हो और वह उसके मुताबिक फैसला करता हो और लोगों को उसकी तालीम देता हो।

फायदे : रश्क यह है कि किसी में अच्छी खूबी देखकर इन्सान अपने लिए उसकी तमन्ना करे और अगर मकसूद यह हो कि उससे वह नेमत छिन जाये और मुझे हासिल हो जाये तो उसे हसद कहते
हैं और यह बुराई के लायक है

*66 :- इब्ने अब्यास रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मुझे एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सीने से लगाया और दुआ दी कि ऐ अल्लाह! इसे अपनी किताब का इल्म अता फरमां।

*67 :- इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि मैं एक दिन गधे पर सवार होकर आया, “उस वक्‍त में बालिग (जवान) होने के करीब था और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मिना में किसी दीवार को सामने किये बगैर नमाज पढ़ा रहे थे। मैं एक सफ के आगे से गुजरा और गधे
को चरने के लिए छोड़ दिया और खुद सफ में शामिल हो गया, तो मुझ पर किसी ने एतराज नहीं
किया।

*68 :- महमूद बिन रवी रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मुझे (अब तक) नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक कुल्‍ली याद है जो आपने एक डोल से पानी लेकर मेरे चेहरे पर की थी, उस वक्‍त मैं पांच बरस का था।
*फायदे : मालूम हुआ कि समझदार बच्चे भी इल्म की मजलिस में हाजिर हो सकते हैं और इल्म वाले उनसे खुशी भी जाहिर कर सकते हैं।

*69 :- अबू मूसा अशअरी रजि. से रिवायत है कि वह नवी सल्लल्लाहु अलैहि ‘वसल्लम से बयान करते हैं कि आपने फरमाया कि अल्लाह तआला ने जो हिदायत और इल्म मुझे देकर भेजा है, उसकी मिसाल तेज बारिश की सी है। जो जमीन पर बरसे, फिर साफ और उम्दा (अच्छी) जमीन तो पानी को जज्ब कर लेती (सोस लेती) है और बहुत सी घास और सब्जा उगाती है, जबकि सख्त जमीन पानी को रोकती है, फिर अल्लाह तआला उससे लोगों को फायदा पहुंचाता है। लोग खुद भी पीते हैं और जानवरों को भी पिलाते हैं
*
और उसके जरीये खेती-बाड़ी भी करते हैं। और कुछ बारिश ऐसे हिस्से पर बरसी जो साफ और चटीला मैदान था, वह ना तो पानी को रोकता है और ना ही सब्जा उगाता है, पस यही मिसाल उस आदमी की है, जिसने अल्लाह के दीन में समझ हासिल की और जो तालीमात देकर अल्लाह तआला ने मुझे भेजा है, उनसे उसे फायदा हुआ। यानी उसने उन्हें खुद सीखा और दूसरों को सिखाया और यहीं उस आदमी की मिसाल है जिसने सर तक ना उठाया और अल्लाह की हिदायत को जो मैं देकर भेजा गया हूँ, कुबूल न किया।

*70 :- अनस रजि. से ही रिवायत है, कि उन्होंने कहा रसूलुरलाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया : “कयामत की निशानियों में से है कि इल्म उठ जायेगा और जिहालत फैल जायेगी। शराब बहुत ज्यादा पी जायेगी और जिनाकारी (बलात्कार) आम हो जायेगी।” औरतें ज्यादा और मर्द कम होंगे, यहां तक कि एक मर्द पचास औरतों का सरदार होगा।
फायदे : कयामत के करीब मर्दों के कम और औरतों के ज्यादा होने की वजह यह बयान की जाती है कि ऐसे हालात में लड़ाईयां बहुत होगी। एक हुकूमत दूसरी पर चढ़ाई करेगी, उन लड़ाईयों में मर्द मारे जायेंगे और औरतें ज्यादा बाकी रह जायेगी।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-6

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “

*51 :- जरीर बिन अब्दुल्लाह ब-जलली रजि. से रिवायत है, .उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नमाज पढ़ने,जकात देने और हर मुसलमान से शिया खैर ख्वाही करने (के इकरार) पर बैअत की।

फायदे : यह हदीस इस्लाम के तमाम दर्जों को शामिल है। इमाम बुखारी इस बाब को किताबुल ईमान के आखिर में लाकर इशारा कर रहे हैं कि मैंने किताब की जमा और तरतीब में लोगों की खैर ख्वाही की है, वह हदीसें बयान की हैं जो बिलकुल सही हैं ताकि अमल करने में आसानी रहे। नीज यह हदीस इतनी ठोस है कि मुहद्दसीन के नजदीक इस्लाम के चौथाई हिस्से पर शामिल है।

*52 :- जरीर बिन अब्दुल्लाह रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर हुआ और अर्ज किया कि मैं आपसे इस्लाम पर बैअत करना चाहता हूँ तो आपने मुझसे हर मुसलमान के साथ खैर ख्वाही करने का अहद (वादा) लिया, पस इसी पर मैंने आपसे बैअत कर ली।

फायदे : काफिरों को भी नसीहत की जाये। उन्हें इस्लाम की दावत दी जाये और जब वह मशवरा लें तो उनकी सही रहनुमाई की जाये, अलबत्ता बैअत का सिलसिला सिर्फ इस्लाम वालों के लिए है।

*53 :- अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मजलिस में लोगों से कुछ बयान कर रहे थे कि एक देहाती आपके पास आया और कहने लगा, कयामत कब आयेगी? रसूलुल्लाह सल्लल्लाइु अलैहि वसल्लम (उसे कोई जवाब दिये बगैर) अपनी बातों में लगे रहे। (हाजरीन में से) कुछ लोग कहने लगे, आपने देहाती की बात को सुन तो लिया, लेकिन उसे पसन्द नहीं फरमाया और कुछ कहने लगे ऐसा नहीं बल्कि आपने सुना ही नहीं।
*
जब आप अपनी गुफ्तगू (बातचीत) खत्म कर चुके तो आपने फरमाया: कयामत के बारे में पूछने वाला कहां हैं? देहाती ने कहा, हाँ ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मैं हाजिर हूँ। आपने फरमाया : जब अमानत जाया कर दी जाये तो कयामत का इन्तजार करो। उसने मालूम किया कि अमानत किस तरह जाया होगी? आपने फरमाया : जब (जिम्मेदारी के) काम नालायक लोगों के हवाले कर दिये जायें तो कयामत का इन्तजार करना।

फायदे : अगर से मुराद दीनी मामलात हैं, जैसे खिलाफत, फैसला करना और फतवे देना वगैरह। इससे मालूम हुआ कि दीनी जरूरियात के लिए उलमा की तरफ जाना चाहिए और इल्म वालों की
जिम्मेदारी है कि वह हक तलाश करने वालों को तसल्‍ली बख्श जवाब दें ।

*54 :- अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि. से रिवायत है कि उन्होंने फरमाया: एक सफर में नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम हम से पीछे रह गये थे, फिर आप हमें इस हालत में मिले कि हम से नमाज में देर हो गई थी और हम (जल्दी जल्दी) बुजू कर रहे थे, हम अपने पांव (खूब धोने के बजाये उन) पर मसह की तरह गीले हाथ फैरने लगे। यह देखकर आपने तेज आवाज से दो या तीन बार फरमाया: दोजख में जाने वाली एड़ियों के लिए बर्बादी ।

फायदे : मालूम हुआ कि जरूरत के वक्‍त तेज आवाज से नसीहत करने में कोई हर्ज नहीं है। मुस्लिम की हदीस से मालूम होता है कि समझाने के वक्‍त ऐसा अन्दाज नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है।

*55 :- इनने उमर रजि, से रिवायत है कि उन्हों ने कहा: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “पेड़ों में एक पेड़ ऐसा है जिसके पत्ते नहीं झड़ते और वह मुसलमान की तरह है। मुझे बतलायें, वह कौन-सा पेड़ है? इस पर लोगों ने जंगली पेड़ों का खयाल किया। अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. ने कहा, मेरे दिल में आया कि वह खजूर का पेड़ है, लेकिन (बुजुर्गों से) मुझे शर्म आयी, आखिर सहाबा किराम रजि. ने कहा, आप ही बता दीजिए, वह कौनसा पेड़ है? आपने फरमाया: “वह खुजूर का पेड़ है।

फायदे : मालूम हुआ! कि दीन समझने और इल्म हासिल करने में शर्म नहीं करनी चाहिए, नीज यह भी मालूम हुआ कि बड़ों का अदब करते हुये उन्हें बात करने का पहले मौका दिया जाये।

*56 :-अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया: एक बार हम मस्जिद में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ बैठे हुये थे कि इतने में एक ऊंट सवार आया और अपने ऊंट को उसने मस्जिद में बिठाकर बांध दिया, फिर पूछने लगा कि तुममें से मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कौन हैं? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस वक्‍त सहाबा किराम रजि. में तकिया लगाये बैठे थे।
कि कहा: यह सफेद रंग वाले तकिया लगाये हुये हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। तब वह आपसे कहने लगा ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटे! इस पर आपने फरमाया: कहो! मैं तुझे जवाब देता हूँ। फिर उस आदमी ने आपसे कहा कि मैं आपसे कुछ मालूम करने वाला हूँ और उसमें सख्ती करूंगा। आप दिल में मुझ पर नाराज ना हों। फिर आपने फरमाया (कोई बात नहीं) जो चाहे पूछ! तब उसने कहा: मैं आपको आपके मालिक और आपसे पहले वाले लोगों के मालिक की कसम देकर पूछता हूँ, क्या अल्लाह ताला ने आपको तमाम इन्सानों की तरफ नबी बनाकर भेजा हैं? आपने फरमाया: हाँ अल्लाह तआला गवाह है। फिर उसने कहा: आप को अल्लाह की कसम देता हूँ। क्या अल्लाह तआला ने आपको दिन रात में पांच नमाजें पढ़ने का हुक्म दिया है? आपने फरमाया : हाँ अल्लाह तआला गवाह है। फिर उसने कहा : मैं आपको अल्लाह की कसम देता हूँ क्या अल्लाह तआला ने साल भर में रमजान के रोजे रखने का हुक्म दिया है? आपने फरमाया: हाँ, अल्लाह गवाह है। फिर कहने लगा : मैं आपको अल्लाह की कसम देता हूँ क्या अल्लाह तआला ने आपको हुक्म दिया है कि आप हमारे मालदारों से सदका लेकर हमारे फकीरों पर तकसीम करें? आपने फरमाया, होँ अल्लाह गवाह है। उसके बाद वह आदमी कहने लगा: मैं उस (शरीअत) पर ईमान लाता हूँ, जो वह लाये हैं। मैं अपनी कौम का नुमाईन्दा बनकर आपकी खिदमत में हाजिर हुआ हूँ, मेरा नाम जिमाम बिन सालबा है और मैं साद बिन अबु बकर नामी कबीले से ताल्लुक रखता हूँ।
फायदे : इस हदीस से खबरे वाहिद (एक आदमी के बयान) पर अमल करने का सबूत मिलता है। नीज अगर दादा की शोहरत ज्यादा हो तो उसकी तरफ निस्बत करने में कोई हर्ज नहीं।

58 : इन्‍ने अब्बास रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपना खत एक आदमी के साथ भेजा और उससे फरमाया कि यह खत बहरैन गर्वनर को पहुंचा दो, फिर बहरैन के हाकिम ने उसको किसरा तक पहुंचा दिया। किसरा ने उसे पढ़कर फाड़ दिया। रावी ने कहा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
ने उन पर बद-दुआ की कि अल्लाह करे वह भी दुकड़े-दुकड़े कर दिये जायें।

फायदे : इस हदीस से मुनावला और इल्म वालों की बातों को लिख करके दूसरे मुल्कों में भेजने का सबूत मिलता है, नीज यह भी मालूम हुआ कि गैर मुस्लिम हुकूमत से जंग का ऐलान करने से पहले उसे दीने इस्लाम की दावत दी जाये ।

59 : अनस रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नवी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने एक खत लिखा या लिखने का इरादा फरमाया। जब आपसे कहा गया कि वह लोग बगैर मुहर लगा खत नहीं
पढ़ते तो आपने चांदी की एक अंगूठी बनवाई जिस पर “मुहम्मद रसूलुल्लाह’”’ के अलफाज नक्श थे। हजरत अनस रजि. का बयान है कि (इसकी खुबसूरती मेरी नजर में बस गयी) गोया अब भी आपके हाथ में उसकी सफेदी को देख रहा हूँ।

फायदे : मालूम हुआ कि चांदी की अंगूठी इस्तेमाल करना जाइज है।

60 : अबू वाकिद लैसी रजि. से रिवायत है कि एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
मस्जिद में लोगों के साथ बैठे हुये थे, इतने में तीन आदमी आये। उनमें से दो तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आ गये और एक वापस चला गया। रावी कहता है कि वह दोनों
कुछ देर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास ठहरे रहे। उनमें से एक ने हलके में गुंजाईश
देखी तो बैठ गया और दूसरा सबसे पीछे बैठ गया। तीसरा तो जा ही चुका था। जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (तकरीर से) फारिग हुये तो फरमाया : “क्या मैं तुम्हें उन तीनों आदमियों का हाल न बताऊँ? उनमें से एक ने अल्लाह की तरफ रूजू किया तो अल्लाह ने भी उसे जगह दे दी और दूसरा शरमाया तो अल्लाह ने उससे शर्म की और तीसरे ने पीठ फेरी तो अल्लाह ने भी उससे मुंह मोड़ लिया।”
फायदे : इस हदीस में अल्लाह के लिए शर्म का सबूत मिलता है। बाज इल्म वालों ने इसकी तावील की है कि इससे मुराद रहम करना और किसी को अजाब न देना है, लेकिन तहकीक करने वाले अस्लाफ ने इस अन्दाज को पसन्द नहीं किया, बल्कि उनके नजदीक अल्लाह की खूबियों को ज्यों का त्यों माना जाये।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-5

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*41 : उमर बिन खत्ताब रजि. से रिवायत है कि एक यहूदी ने उनसे कहा, ऐ मोमिनों के अमीर! तुम्हारी किताब (कुरआन) में एक ऐसी आयत है, जिसे तुम पढ़ते रहते हो, अगर वह आयत हम यहूदियों पर नाजिल होती तो हम उस दिन को ईद का दिन ठहराते। उमर ने कहा, वह कौनसी आयत हैं? यहूदी बोला यह आयत “आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन पूरा कर दिया और अपना एहसान भी तुम पर तमाम कर दिया और दीने इस्लाम को तुम्हारे लिए पसन्द किया” उमर ने कहा कि हम उस दिन और उस मकाम को जानते हैं, जिसमें यह आयत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाजिल हुई। यह आयत जुमा के दिन उतरी जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अरफात में खड़े थे।

फायदे : आयते करीमा से मालूम हुआ कि इसके नाजिल होने से पहले दीन (ईमान) पूरा नहीं था, बल्कि अधूरा था, लिहाजा इसमें कमी और ज्यादती हो सकती है, इमाम बुखारी रह. फरमाते हैं कि मैं
कई शहरों में हजार से ज्यादा इल्म वालों से मिला हूँ। तमाम का यही मानना था कि ईमान कोल और अमल का नाम है और यह कम और ज्यादा होता रहता है।

42 : तलहा बिन उबैदुल्लाह रजि. का बयान है कि नज्द वालों में से एक आदमी बिखरे बालों वाला रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया। हम उसकी आवाज की गुनगुनाहट सुन रहे थे, मगर यह ना समझते थे कि क्या कहता है, यहां तक कि वह करीब आ गया, तब मालूम हुआ कि यह इस्लाम के बारे मे पूछ रहा है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “दिन रात में पांच नमाजें हैं” उसने कहा इनके अलावा (भी) मुझ पर कोई नमाज फर्ज है? आपने फरमाया:’नहीं मगर यह कि तू अपनी खुशी से पढ़े।” (फिर) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया : “और रमजान के रोजे रखना” उसने अर्ज किया : और तो कोई रोजा मुझ पर फर्ज नहीं।

आपने फरमाया: नहीं मगर यह कि तू अपनी खुशी से रखे। तलहा रजि, कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उससे जकात का भी जिक्र किया, उसने कहा: मुझ पर इसके अलावा भी (निफ्ली सदका) फर्ज हैं? आपने ‘फरमाया: “नहीं मगर यह कि तू अपनी खुशी से दे।”’ तलहा
रजि, ने कहा कि फिर वह आदमी यह कहता हुआ पीठ फेरकर वापस चला गया कि अल्लाह की कसम! न मैं इससे ज्यादा करूंगा और न कम। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने
‘फरमाया: “अगर यह सच कह रहा है तो कामयाब हो गया।”

फायदे : इस हदीस से मालूम हुआ कि वित्र फर्ज नहीं है, बल्कि नमाज तहज्जुद का हिस्सा होने की वजह से नफ्ल है, क्योंकि इस हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ पांच नमाजों
को फर्ज फरमाया और बाकी को नफ्ल करार दिया है।

*43 : अबू हुरैरा रजि, से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “जो कोई
ईमानदार होकर सवाब हासिल करने की नियत से किसी मुसलमान के जनाजे के साथ जाये और
नमाज व दफन से फरागत होने हीं दर तक उसके साथ रहे तो वह दो कीरात सवाब लेकर वापस आता है। हर कीरात उहुद पहाड़ के बराबर है। और जो आदमी जनाजा पढ़कर दफन से पहले लौट आये तो वह एक कीरात सवाब लेकर लोटता है।

फायदे : आखिरत वे लिहाज से एक कीरात उडुद पहाड़ के बराबर होगा, अलबत्ता दुनिया में एक कीरात बारह दिरहम के बराबर होता है। इस हदीस से जनाजे के साथ चलने, नमाज पढ़ने और दफन के बाद वापस आने की अहमीयत का पता चलता है।

*44 : अब्दुल्लाह बिन मसउद रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
“मुसलमान को गाली देना फिस्क और उससे लड़ना कुफ़ है।”’

फायदे : इमाम बुखारी ने इस हदीस से यह भी साबित किया है कि आपस में गाली देना और लान तान करना एक मुसलमान की शान के खिलाफ है।नीज एक दूसरे की नाहक गर्दने मारने से ईमान खतरे में पड़ सकता है । नीज हदीस में जिक्र किये गये कुफ़ से हकीकी कुफ़ मुराद नहीं जो इन्सान को इस्लाम के दायरे से निकाल देता है, बल्कि लुगवी कुफ्र मुराद है।

* 45 : उबादा बिन सामित रजि, रो रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार कद्र की रात बताने के लिए अपने कमरे से निकले, इतने में दो मुसलमान आपस में झगड़ पड़े। आपने
‘फरमाया : मैं तो इसलिए बाहर निकला था कि तुम्हें कद की रात बताऊँ, मगर फलां फलां आदमी
झगड़ पड़े इसलिए वह (मेरे दिल से) उठा ली गयी और शायद यही तुम्हारे हक में फायदेमन्द हो। अब तुम शबे कद को रमजान की सत्ताईसवीं, उन्तीसवीं और पच्चीसववीं रात में तलाश करो।

फायदे : इस हदीस से मालूम हुआ कि आपस में लड़ना झगड़ना संगीन जुर्म है क्योंकि इसकी नहूसत से शबे कद जैसी अजीम दौलत से हमें महरूम कर दिया गया। शबे कद को नहीं बल्कि उसकी ताईन को उठाया गया, इसमें यह हिकमत थी कि इसकी तलाश में लोग ज्यादा से ज्यादा इबादत करें।

*45 :- अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि एक दिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों के सामने तशरीफ फरमा थे कि अचानक एक आदमी आपकी खिदमत में हाजिर हुआ और पूछने लगा कि ईमान कया है? आपने फरमाया: ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उसके फरिश्तों पर और हश के दिन अल्लाह के सामने पेश होने पर, अल्लाह के रसूलों पर ईमान लाओ और कयामत का यकीन करो। उसने फिर सवाल किया कि इस्लाम क्या है? आपने फरमाया: “इस्लाम यह है कि तुम महज अल्लाह की इबादत करो और उसके जगह किसी को शरीकन करो, नमाज को ठीक तौर पर अदा करो, फर्ज जकात अदा करो और रमजान के रोजे रखो।
*फिर उसने पूछा कि एहसान क्या है?आपने फरमाया: एहसान यह है कि तुम अल्लाह की इबादत इस तरह करो, गोया तुम उसे देख
रहे हो, अगर तुम उसे नहीं देख रहे हो, वह तो तुम्हें देख रहा है। उसने कहा: कयामत कब आयेगी? आपने फरमाया: जिससे सवाल किया गया है, वह भी सवाल करने वाले से ज्यादा नहीं जानता, अलबत्ता मैं तुम्हें कयामत आने की कुछ निशानियाँ बता देता हूँ। जब नौकरानी अपने आका को जनेगी और जब ऊंटों के अनजान काले कलूटे चरवाहे आसमान छूती इमारते बनाने में एक दूसरे पर बाजी ले जायेंगे तो (कयामत करीब होगी) ।

दरअसल कयामत उन पांच बातों में से है, जिनको अल्लाह के अलावा और कोई नहीं जानता, फिर आपने यह आयत तिलावत फरमायी, “बेशक अल्लाह ही को कयामत का इल्म है…” उसके बाद वह आदमी वापस चला गया तो आपने फरमायाः “उसे मेरे पास लावो, चूनांचे लोगों ने उसे तलाश किया, लेकिन उसका कोई सुराग न॑ मिला। तो आपने फरमाया: “यह जिब्राईल थे जो लोगो को उनका दीन सिखाने आये थे।”’

फायदे : इस हदीस में इशारा है कि कयामत के करीब मामलात नालायक लोगों के हवाले हो जायेंगे। एक दूसरी हदीस में है कि जब नालायक और जलील लोग हुकूमत संभालें तो कयामत का
इंतजार करना, अफसोस! कि आज हम इस किस्म के हालात से दोचार हैं।

*47 :- नोमान बिन बशीर रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना, आप फरमा रहे थे कि हलाल
जाहिर है और हराम (भी) जाहिर और शुबा की चीजें हैं, जिन्हें ज्यादातर लोग नहीं जानते, पस
जो आदमी इन शक और शुबा की चीजों से बच गया, उसने अपने दीन और अपनी इज्जत को बचा लिया और जो कोई इन शक और शुबा वाली चीजों में पड़ गया, उसकी मिसाल उस जानवर चराने वाले की सी है, जो बादशाह की चरागाह के आस पास (अपने जानवरों को) चराये, करीब है कि चरागाह के अन्दर उसका (जानवर) घुस जाये। आगाह रहो
कि हर बादशाह की एक चरागाह होती है,खबरदार! अल्लाह की चरागाह उसकी जमीन में हराम की हुई चीजें हैं।

सुन लो! बदन में एक टुकड़ा (गोश्त का) है, जब वह ठीक रहता है तो सारा बदन ठीक रहता है और जब वह बिगड़ जाता है तो सारा बदन खराब हो जाता हैं। आगाह रहो, वह टुकड़ा दिल है।
*फायदे : इमाम बुखारी ने इस हदीस से यह भी साबित किया है कि शक और शुबा की चीजों से परहेज करना (बचना) तकवा की निशानी है।
शक और शुवा से मुराद वह मुश्किल मामलात हैं कि उन पर यकीनी तौर पर कोई हुक्म न लगाया जा सकता हो, अगरचे इल्म वाले किसी हद तक उनसे बेखबर होते हैं फिर भी शकों से खाली नहीं होते।

*48 :- इबने अब्वास रजि, से रिवायत है कि अब्दुल कैस की जमात के लोग जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आये तो आपने फरमाया कि यह कौन लोग हैं, या कौन से नुमाईन्दे हैं? उन्होंने कहा: हम खानदान रवीया के लोग हैं। आपने फरमाया, तुम आराम की जगह आये हो, न जलील होंगे न शर्मिन्दा! फिर उन लोगों ने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! हम हुरमत वाले महिनों के अलावा दूसरे दिनों में आपके पास नहीं आ सकते, क्यों कि हमारे और आपके बीच मुजर के काफिरों का कबीला रहता है,
*
लिहाजा आप खुलासा के तौर पर हमें कोई ऐसी बात बता दें कि हम अपने पीछे वालों को उसकी खबर कर दें और हम सब इस (पर अमल करने) से जन्नत में दाखिल हो जायें । फिर उन्होंने आप से पीने वाली चीजों के मुताल्लिक भी पूछा तो आपने उन्हें चार बातों का हुक्म दिया और चार बातों से मना किया। आपने उन्हें एक अल्लाह पर ईमान लाने का हुक्म दिया, फिर आपने फरमाया कि तुम जानते हो, सिर्फ एक अल्लाह पर ईमान दी क्या है?

उन्होंने कहा कि अल्लाह और उसके रसूल ही खूब जानते हैं। आपने फरमाया: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अलावा और कोई इबादत के लायक नहीं और हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके रसूल हैं, नमाज ठीक तरीके से अदा करना, जकात देना, रमजान के रोजे रखना और गनीमत के माल से पांचवां हिस्सा अदा करना और शराब बनाने के चार बरतनों यानी बड़े मटकों, कदू से तैयार किये हुए प्यालों, लकड़ी से तराशे हुये लगन और डामर से रंगे हुये रोगनी बर्तनों से उन्हें मना किया। फिर आपने फरमाया : कि इन बातों को याद रखो और अपने पीछे वालों को इनसे खबरदार कर दो।
फायदे : हुरमत के महीनों से मुराद रजब “जुलकअदा” जिलहिज्जा और मुहर्रम हैं। काफिर इनकी बेहद इज्जत करते थे और इनमें किसी दूसरे पर हाथ चलाने (लड़ने) से बचते थे। इस हदीस से
मालूम हुआ कि आने वाले मेहमानों को खुश आमदीद कहना इस्लामी अदब है, नीज एक मुसलमान के लिए जरूरी है कि वह ईमान और इल्म को अपने सीने में महफूज करके दूसरों तक
पहुंचाये।

*49 :- उमर बिन खत्ताब रजि, से मरवी हदीस कि अमलों का दारोमदार नियत पर है। शुरू किताब में गुजर चुकी है, अलबत्ता इस मकाम पर “हर इन्सान को वही मिलेगा, जो वह नियत करेगा।”’ के बाद कुछ इजाफा है कि अगर कोई अपना मुल्क अपने अल्लाह और उसके रसूल के लिए छोड़ेगा तो उसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल की
तरफ होगी, फिर उन्होंने बाकी हदीस को बयान किया, जो पहले गुजर चुकी है।

*50 :- अबू मसऊद रजि. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं कि आपने फरमाया: जब मर्द अपनी बीवी पर सवाब की नियत से खर्च करता है तो वो भी उसके हक में सदका होता है।

फायदे : मालूम हुआ कि अपने वीवी-बच्चों पर खुश दिली से खर्च करना भी सवाब का जरीया हैं। बशर्ते कि सवाबकी नियत हो, इसके बगैर जिम्मेदारी तो अदा हो जायेगी, लेकिन सवाब नहीं मिलेगा।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-4

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*31 :अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “मुनाफिक की तीन निशानियां हैं, जब बात करे तो झूट बोले, जब वादा करे तो वादा खिलाफी करे और जब उसके पास अमानत रखी जाये तो खयानत करे।”’

*32 : अब्दुल्लाह बिन अम्र रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “चार
बातें जिसमें होंगी वह तो खालिस (पक्का) मुनाफिक होगा और जिसमें इनमें से कोई एक भी होगी, उसमें निफाक की एक आदत होगी, यहां तक कि वह उसे छोड़ दे, जब उसके पास अम्मनत रखी जाये तो खयानत करे, जब बात करे तो झूट बोले, जब वादा करे तो दगावाजी करे और जब झगड़े तो बेशदा बकवास करे।

फायदे : निफाक की दो किसमें हैं, एक निफाक तो ईमान व अकीदे का होता है, जो कुफ़ की बदतरीन किस्म है, जिसकी निशानदही सिर्फ वहय से मुमकिन है, दूसरा अमली निफाक है, जिसे सीरत
और किरदार का निफाक भी कहते हैं। हदीस का मतलब यह है कि जिस आदमी में निफाक की मिशानियों में से कोई एक निशानी है तो उसे समझना चाहिए कि मुझ में मुनाफिकाना आदत है और जिसमें यह तमाम निशानियाँ जमां हो, वह सीरत और किरदार में खालिस(पक्का) मुनाफिक है ।

*33 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “जो आदमी इमान का तकाजा समझकर सवाब की नियत से शबे कदर का कयाम करेगा, उसके सारे पिछले गुनाह बख्श दिये जायेंगे।’

*34 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सें बयान करते हैं कि आपने फरमाया : “अल्लाह तआला उस आदमी के लिए जिम्मेदारी लेता है जो उसकी राह में (जिहाद
के लिए) निकले, उसे घर से सिर्फ इस बात ने निकाला कि वह मुझ (अल्लाह) पर ईमान रखता है और मेरे रसूलों को सच्चा जानता है तो मैं उसे उस सवाब या माले गनीमत के साथ वापिस करूंगा,
जो उसने जिहाद में पाया है, या उसे (शहीद बनाकर) जन्नत मे ही करूंगा। (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया) अगर मैं अपनी उम्मत पर मुश्किल न समझता तो कभी
भी छोटे से छोटे लश्कर के पीछे न बैठा रहता और मेरी यह तमन्ना है कि अल्लाह के रास्ते में मारा जाऊँ, फिर जिन्दा किया जाऊँ, फिर मारा जाऊँ फिर जिन्दा किया जाऊँ, फिर मारा जाऊँ। फिर जिन्दा किया जाऊँ।

*35 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “जो आदमी रमजान में ईमानदार होकर सवाब हासिल करने के लिए रात के वक्‍त नमाज पढ़ेगा तो उसके पिछले गुनाह माफ कर दिये जायेंगे।”
*फायदे : गुनाहों की माफी में बन्दों के हुकूक शामिल नहीं है, क्योंकि इस बात पर उम्मत का इत्तेफाक है कि ऐसे हुकूक हकदारों की रजामन्दी से ही खत्म हो सकते हैं। कयामत के दिन हकदारों की बुराईयाँ लेकर और अपनी नेकियाँ देकर इनकी तलाफी मुमकिन है। मगर यह कि अल्लाह उनको अपनी तरफ से सवाब देकर राजी कर दे।

*36 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “बेशक दीन इस्लाम बहुत आसान है और जो आदमी दीन में सख्ती करेगा तो दीन उस पर गालिब आ जायेगा,
इसलिए बीच का रास्ता इख्तयार करो और करीब रहो और खुश हो जावो (कि तुम्हें ऐसा आसान दीन मिला है)। सुबह, दोपहर के बाद और कुछ रात में इबादत करने से मदद हासिल करो।”’
*फायदे : मतलब यह है कि एक मुसलमान को राहत और सुकून के वक्‍तों में निहायत दिलचस्पी से इबादत का फरीजा अदा करना चाहिए ताकि उसका अमल लगातार कायम रहे, क्योंकि थोड़ासा
अमल डट कर और बराबर करना उस बड़े अमल से कहीं बढ़कर है, जो करके छोड़ दिया जाये।

*37 : बरा बिन आजिब रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम जब (हिजरत करके) मदीना तशरीफ लाये तो पहले अपने ददिहाल या ननिहाल जो अन्सार से थे, उनके यहां उतरे और (मदीना में) सोलह या सतरह महीने बैतुलमुकददस की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते रहे। फिर भी चाहते थे कि आप का किब्ला काअबा की तरफ हो जाये (चूनांचे हो गया) और पहली नमाज जो आपने (काअबा की तरफ) पढ़ी वह असर की नमाज थी और आप के साथ कुछ और लोग भी थे, उनमें से एक आदमी निकला और किसी मस्जिद वालों के पास से उसका गुजर हुआ,
*
वह (बैतुलमुकददस की तरफ मुंह किये हुये) रकूअ की हालत में थे तो उसने कहा कि मैं अल्लाह को गवाह बनाकर कहता हूँ कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मक्का की तरफ (मुंह करके) नमाज पढ़ी है (यह सुनते हीं) वह लोग जिस हालत में थे, उसी हालत में काअबा की तरफ फिर गये और जब आप बैतुलमुकदस की तरफ (मुंह करके) नमाज पढ़ते थे तो यहूदी और नसरानी (इसाई) बहुत खुश होते थे, लेकिन जब आपने अपना मुंह काअबा की तरफ फेर लिया तो
यह उन्हें बहुत ना-गवार (नापसन्द) गुजरा।

फायदे : इस हदीस में यह भी है कि किब्ला बदलने से पहले जो लोग मर चुके थे, उनके बारे में हमें मालूम नहीं था कि उन्हें नमाज का सवाब मिलेगा या नहीं? तो अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी,
“ऐसा नहीं है कि अल्लाह तआला तुम्हारा ईमान यानी तुम्हारी नमाजें बेकार कर दे।” आयते करीमा में नमाज की ताबीर ईमान से की गई है। मालूम हुआ कि नमाज जो एक अमल है यह ईमान का हिस्सा है, और इसमें कमी और बेशी मुमकिन हो सकती है।

*38 : अबू सईद खुदरी रजि. से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से
सुना, आप फरमा रहे थे कि जब कोई बन्दा मुसलमान हो जाता है और इस्लाम पर अच्छी तरह अमल पैरा रहता है तो अल्लाह तआला उसके वह तमाम गुनाह माफ कर देता है, जो उसने (इस्लाम कबूल करने से पहले) किये थे और उसके बाद (फिर) मुआवजा (शुरू) होता है कि एक नेकी का
बदला उसके दस गुने से सात सौ गुना तक और बुराई का बदला तो बुराई के बराबर ही दिया जाता है, मगर यह कि अल्लाह तआला उसे माफ फरमा दे।

फायदे : दार कुतनी की एक रिवायत में यह भी है कि अल्लाह तआला उसकी हर नेकी को शुमार करेगा जो उसने इस्लाम से पहले की थी। मालूम हुआ कि काफिर अगर मुसलमान हो जाता है तो कुफ्र के जमाने की नेकियों का भी उसे सवाब मिलेगा।

*39 : आइशा रजि. से रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार उनके पास तशरीफ़ लाये वहां एक औरत बैठी थी। आपने
पूछा यह कौन है? आइशा रजि, ने कहा कि यह फलां औरत है और उसकी (बहुत ज्यादा) नमाज
का हाल बयान करने लगीं। आपने फरमाया रूक जा! तुम अपने जिम्मे सिर्फ वही काम रखो जो
(हमेशा) कर सकती हो। अल्लाह की कसम! अल्लाह तआला सवाब देने से नहीं थकता, तुम ही इबादत करने से थक जाओगे। और अल्लाह तआला को सबसे ज्यादा पसन्द फरमां बरदारी का वह काम है, जिसका करने वाला उस पर हमेशगी बरते।

फायदे : दरमियानी चाल के साथ नेक अमल पर हमेशगी बरतनी चाहिए, नीज यह भी मालूम हुआ कि इबादत करते वक़्त बहुत सख्ती उठाना एक नापसन्दीवा काम है।

*40 : अनस रजि. से रिवायत है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बयान करते हैं कि आपने फरमाया: “जिसने “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहा और उसके दिल में एक जौं के बराबर नेकी यानी ईमान हुआ, वह दोजख से (जरूर) निकलेगा और जिसने “ला इलाहा इल्लल्लाह”‘ कहा और उसके दिल में गेहूं के दाने के बरावर भलाई (ईमान) हो, वह दोजख से जरूर निकलेगा और जिसने “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहा और उसके दिल में एक जर्रा बरावर ईमान हो,वह भी दोजख से जरूर निकलेगा।

फायदे : सूरज की किरणों में सूई की नोक के बराबर बेशुमार जर्रात उड़ते नजर आते हैं। चार जरें एक राई के दाने के बराबर होते हैं। और सौ जर्रात एक जौ के दाने के बराबर होते हैं, हदीस का यह बयान ईमान की कमी और ज्यादती पर दलालत करता है और यह भी मालूम हुआ कि बाज बदअमल तौहीद वाले जहन्नम में दाखिल होंगे। नीज इस बात का भी पता चला कि बड़ा गुनाह
का करने वाला काफिर नहीं होता और न ही यह हमेशा के लिए जहन्नम में रहेगा।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-3

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही निहायत रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

21 : अबू सईद खुदरी रजि. से रिवायत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जन्नत वाले जन्नत में और जहननम वाले जहननम में चले जायेंगे तो अल्लाह तआला फरमायेगा कि जिस आदमी के दिल में राई के दाने के बराबर ईमान हो, उसे जहन्नम से निकाल लाओ तो ऐसे लोगों को जहन्नम से निकाला जायेगा जो जल कर काले हो चुके होंगे। फिर उन्हें पानी या नहरे हयात में डाला’
जायेगा। वह सिरे से ऐसे उगेंगे जैसे दाना नहर के किनारे उगता है। क्या तू देखता नहीं, वह कैसे जर्द जर्द लिपटा हुआ निकलता है।

फायदे : इमाम बुखारी ने वुहैब की रिवायत बयान करके उस शक को दूर कर दिया जो इमाम मालिक को हुआ यानी “जिन्दगी की है नहर” (नहरे हयात) सही है।

22 : अबू सईद खुदरी रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “मैं एक बार सो रहा था, कि ख्वाब की हालत में लोगों को देखा, वह मेरे सामने लाये जाते हैं और वह कुर्ते पहने हुये हैं, कुछ के कुर्ते सीनों तक है और कुछ लोगों के इससे भी कम और उमर बिन खत्ताब रजि, को मेरे सामने इस हालत में लाया गया कि वह जो कुर्ता पहने हुये हैं, उसे जमीन पर घसीट रहे हैं। सहाबा-ए-किराम रजि. ने पूछा
ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आप इस ख्वाब की क्या ताबिर करते हैं? आपने फरमाया, “दीन” ।

फायदे : इस हदीस से मालूम हुआ कि ख्वाब में अपना कुर्ता घसीटते हुये देखना उंचे दर्जे की दीनदारी की पहचान है, नीज यह भी साबित हुआ कि ईमान में कमी और ज्यादती मुमकिन है।

23 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम एक अन्सारी आदमी के पास से गुजरे, जबकि वह अपने भाई को समझा रहा था कि तू इतनी शर्म क्यों करता हैं? रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने उससे फरमाया: “उसे अपने हाल पर छोड़ दो, क्योंकि शर्म तो ईमान का हिस्सा है।”

24 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने
फरमायाः मुझे हुक्म मिला है कि मैं लोगों से जंग जारी रखूं, यहां तक कि वह इस बात की गवाही
दें कि अल्लाह के सिवा कोई माबूदे हकीकी नहीं और बेशक मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के रसूल है। पूरे आदाब से नमाज अदा करें और जकात दें, जब वह यह करने लगें तो उन्होंने अपने जान और माल को मुझ से बचा लिया। सिवाये इस्लाम के हक के और उनका हिसाब अल्लाह के हवाले है।”

फायदे : काफिरों से जग लड़ने का मकसद यह होता है कि वह इस्लाम कबूल करके सिर्फ अल्लाह की इबादत करें, अगरचे इस्लाम में टेक्स और मुनासिब शर्तों के साथ सुलह पर भी जंग खत्म हो
जाती है मगर जंग बन्दी का यह तरीका इस्लामी जंग का असल मकसद नहीं, चूंकि इसके जरीये असल मकसद के लिए एक अमन से भरा हुआ रास्ता खुल जाता है, लिहाजा इस पर भी जंग
रोक दी जाती हैं।

***25 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया, कौनसा
अमल अच्छा है? आपने फरमाया: “अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाना।”
सवाल किया गयाः “फिर कौनसा?”
आपने फरमाया: “अल्लाह की राह में जिहाद करना।”
पूछा गया : “फिर कौन सा?”
आपने फरमाया: “वह हज जो कुबूल हो।”’
*फायदे : हज्जे मबरूर से मुराद यह हज है जो दिखावे और गुनाहों से पाक हो। इसकी पहचान यह है कि आदमी अपनी जिन्दगी पहले से बेहतर तरीके पर गुजारे।

26 : साअद बिन अबी वक्‍कास रजि. का बयान है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने
चन्द लोगों को कुछ माल दिया और साअद रजि. खुद बैठे हुये थे। आपने एक आदमी को छोड़
दिया, यानी उसे कुछ न दिया, हालांकि वह तमाम लोगों में से मुझे ज्यादा पसन्द था। मैंने कहा:
ऐ अल्लाह के रसूल! आपने फलां आदमी को छोड़ दिया, अल्लाह की कसम! मैं तो उसे मोमिन
समझता हूँ। आपने फरमाया: “या मुसलमान” मैं थोड़ी देर खामोश रहा, फिर उसके बारे मैं जो जानता था, उसने मुझे बोलने पर मजबूर किया ।

मैंने दोबारा अर्ज किया कि आपने फलां आदमी को क्यों नजर अन्दाज कर दिया? अल्लाह की कसम! मैं तो इसे मोमिन ख्याल करता हूँ। आपने फरमाया: “’या मुसलमान” फिर मैं थोड़ी देर चुप रहा, फिर उसके बारे में जो मैं जानता था, उसने मजबूर किया तो मैंने तीसरी बार वही अर्ज किया और ‘रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने भी वहीं फरमाया। उसके बाद आप कहने लगे ऐ साअद! मैं एक आदमी को कुछ देता हूँ हालांकि दूसरे आदमी को उससे बेहतर ख्याल करता हूँ,
इस अन्देशा के पेशे नजर कि कहीं अल्लाह तआला उसे आँघे मुंह दोजख में धकेल दे।

फायदे : मालूम हुआ कि जिसके अन्दरूनी हालात का इल्म न हो, उसे मोमिन नहीं कहना चाहिए, क्योंकि अन्दर की बातों पर अल्लाह के अलावा और कोई नहीं जान सकता। अलबत्ता उसके जाहिरी हालात के पेशे नजर उसे मुसलमान कह सकते हैं।

27 :- इबने अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “मैंने दोजख में ज्यादातर औरतों को
देखा (क्योंकि) वह कुफ़ करती हैं। लोगों ने कहा : क्या वह अल्लाह का कुफ़ करती है? आपने फरमाया: “नहीं बल्कि वह अपने शौहर की नाफरमानी करती है और एहसान फरामोश हैं, वह यूँ कि अगर तू सारी उम्र औरत से अच्छा सलूक करे फिर वह (मामूली सी ना पसन्द) बात तुझ में देखे तो कहने लगती है कि मुझे तुझ से कभी आराम नहीं मिला।’”

फायदे : इमाम बुखारी ने ईमान और उसके समरात बयान करने के बाद उसकी जिद यानी कुफ़ और उसकी किस्मों को बयान करना शुरू किया। कुफ़ की दो किसमें हैं। एक यह कि उसके करने से
इन्सान इस्लाम के दायरे से निकल जाता है और दूसरा वह कुफ् है जिसका करने वाला गुनाहगार तो जरूर होता है, लेकिन इस्लाम से नहीं निकलता। इस मजमून से दूसरी किस्म का कुफ्र मुराद है। यह भी मालूम हुआ कि गुनाहों के करने से ईमान में
कमी आ जाती हैं

28 : अबू जर गिफारी रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैंने एक आदमी को गाली दी कि उसे मां की आर दिलाई। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (यह सुनकर) फरमाया: “क्या तूने उसे उसकी मां से आर दिलाई है? अभी तक तुम में जाहिलियत का असर बाकी है, तुम्हारे गुलाम तुम्हारे भाई हैं उन्हें अल्लाह ने तुम्हारे कब्जे में रखा है, पस जिस आदमी का भाई उसके कब्जे में हो, उसको चाहिए कि उसे वही खिलाये जो खुद खाता है और उसे वही लिबास (कपड़े) पहनाये जो वह खुद पहनता है और उनसे वह काम ना लो जो उन पर भारी गुजरे और अगर ऐसे काम की उन्हें तकलीफ दो तो खुद भी उनका हाथ बटावो ।

फायदे : दूसरी रिवायत में है कि हजरत अबू जर रजि. ने हजरत बिलाल रजि, को सिर्फ इतना कहा था कि ऐ काली-कलूटी औरत के बेटे! हमारे समाज में इस किस्म की बात गाली शुमार नहीं होती, बल्कि सिर्फ मजाक की एक किस्म है, लेकिन शरीअत ने उसे जाहिलियत के जमाने की यादगार से ताबीर किया है।

29 : अबू बकरा रजि. का बयान है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना, आप फरमा रहे थे, “जब दो मुसलमान अपनी
अपनी तलवारें लेकर आपस में झगड़ पड़ें तो मरने वाला और मारने वाला दोनों जहन्नमी हैं”
मैंने अर्ज किया कि ऐ अल्लाह के रसूल (स. अलैहि वसल्लम)! मारने वाला (तो जरूर जहन्‍नमी है) लेकिन मरने वाला क्यों जहननमी होगा? आपने फरमाया : “उसकी नियत भी दूसरे साथी को मारने की थी।””

फायदे : मालूम हुआ कि जब दिल का इरादा पुख्ता हो जाये तो उस पर भी पकड़ होगी, जबकि दूसरी रिवायत में है कि अल्लाह तआला ने उम्मत के दिली ख्यालात को माफ कर दिया है, जब तक
उनके मुताबिक अमल न करें। इन दोनों बातों में फर्क नहीं, क्योंकिं ऐसे ख्यालात पर पकड़ नहीं होगी, जो मजबूत न हों, यानी आयें और गुजर जायें। अलबत्ता पुख्ता इरादे पर जरूर पकड़
होगी, अगरचे उसके मुताबिक अमल न किया जाये।

30 : अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बयान करते हुये फरमाते हैं : जब यह आयत उतरी “जो लोग ईमान लाये और उन्होंने अपने ईमान को जुल्म के साथ आलूदा नहीं
किया।”’ तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सहावा किराम रजि. ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! हम में से कौन ऐसा है, जिसने जुल्म नहीं किया? तब अल्लाह ने यह आयत उतारी “’यकीनन शिर्क बहुत बड़ा जुल्म है।”

फायदे : इस हदीस से मौजूदा जमाने के मुअतजिला का (एक फिरके का नाम) रद्द होता है जो कुरआन समझने के लिए सिर्फ अरबी मायनो को काफी समझते हैं, अगर इनका यह दावा ठीक होता तो सहाबा-ए-किराम कुरआने मजीद के समझने में किसी किस्म की उलझन का शिकार न होते, लिहाजा कुरआन को समझने के लिए साहिबे कुरआन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात
और अमलों को सामने रखना निहायत जरूरी है, यही वह बयान है, जिसकी हिफाजत का खुद अल्लाह तआला ने जिम्मा लिया है।

बुखारी हदीस हिंदी Episode-2

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही निहायत रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*11: अबू भूसा अशअरी रजि. से रिवायत है कि सहाबा किराम रजि. ने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! कौनसा मुसलमान बेहतर हैं? आपने ‘फरमाया, “जिसकी जुबान और ताकत से दूसरे मुसलमान महफूज रहें।”
*12: अब्दुल्लाह थिन अम्र रजि. से रिवायत है कि एक आदमी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा, कि इस्लाम की कौनसी आदत अच्छी है? आपने फरमाया : “तुम (मोहताजों) को
खाना खिलाओ और जानकार और अनजान हर एक (मुसलमान) को सलाम करो।

फायदे : इस हदीस के मुताबिक खाना खिलाने और सलाम करने को एक बेहतरीन अमल बताया गया हैं, जबकि दूसरी हदीसों में अल्लाह के जिक्र और जिहाद और मां-बाप की फरमां बरदारी को
अफजल करार दिया है, इसमें कोई फर्क नहीं है। बल्कि यह फर्क सवाल करने वाले की हालत और जरूरत के लिहाज से है।

*13 : अनस रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया : “तुम में से कोई आदमी मोमिन नहीं हो सकता,’जब तक अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।
फायदे : आदत और अखलाक के बयान में इस आदत को बुनियादी करार दिया गया है। मुसलमानों को चाहिए कि वह मुसलमान भाईयों बल्कि तमाम इन्सानों का खैर-ख्वाह रहे। ऐसे इन्सान की दुनिया और आखिरत बड़े आराम और सुकून से गुजरती है।

*14 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “मुझे कसम है उस अल्लाह की जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम में कोई आदमी मोमिन नहीं हो सकता, जब तक उसको मेरी मुहब्बत अपने बाप और औलाद से ज्यादा न हो जाये।”
फायदे : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से तबई मुहब्बत के अलावा ईमानी मुहब्बत की भी जरूरत है, वरना तबई मुहब्बत तो जनाब अबू तालिब को भी थी, लेकिन उसे मोमिन नहीं कहा गया। बाप और औलाद का खास तौर से जिक्र फरमाया, क्योंकि इन्सान इनसे बेहद मुहब्बत करता है, फिर बाप को पहले किया, क्योंकि बाप सब का होता है, जबकि तमाम के लिए औलाद का होना
जरूरी नहीं।

***15 : अनस रजि. ने भी इस हदीस को इस तरह बयान किया है, लेकिन इसके आखिर में बाप और औलाद के साथ तमाम लोगों (से ज्यादा मुहब्बत) का इजाफा किया है।

फायदे : एक दूसरी रिवायत में है कि जब तक इन्सान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जाते गिरामी को अपनी जान से भी ज्यादा अजीज न समझे, उस वक्‍त तक ईमान पूरा नहीं हो सकता।

*16 – नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “ईमान की मिठास उसी को नसीब होगी जिसमें तीन बातें होगी, एक यह कि अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत उसको सबसे ज्यादा हो, दूसरी यह कि सिर्फ अल्लाह ही के लिए किसी से दोस्ती रखे, तीसरी यह कि दोबारा काफिर बनना उसे ऐसे ही नापसन्द हो, जैसे आग में झोंके जाना नापसन्द होता है।

फायदे : मालूम हुआ कि मारपीट और जिल्‍लत और रूसवाई को कुफ्र पर तरजीह देना बाइसे फजीलत है। अगरचे ईमान ऐसी चीज नहीं जिसे जुबान से चखा जा सके, फिर भी इसमें न देखी जाने वाली मिठास और लज्जत होती है। यह उस आदमी को महसूस होती है, जो हदीस में मजकूरा मकाम पर पहुंच जाये। बाज़ औकात तो यह मिठास इस हद तक महसूस होती है कि बन्दा मोमिन ईमान पर अपनी जान कुरबान करने के लिए भी तैयार हो जाता है। ऐसा इन्सान नेकी और इताअत के काम करने में लज़्ज़त और खुशी महसूस करता है।

*17- अनस रजि. से ही रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया : “ईमान की निशानी अनसार से मुहब्बत रखना और निफाक की निशानी अनसार से कीना (जलन) रखना है।”’

फायदे : अन्सार, मदीना मुनव्वरा के वह लोग हैं जिन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ठहराया और ऐसे वक्‍त में आपका साथ दिया, जबकि और कोई कौम आपकी मदद करने के लिए
तैयार नहीं थी। अन्सार से, आपके मददगार की हैसियत से मुहब्बत करना मुराद है, शख्सी तौर पर किसी से इख्तिलाफ और झगड़ा होना इस से अलग है।

*18- उबादा बिन सामित रजि. का बयान है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आस पास सहाबा रजि. की एक जमाअत थी, तो आपने फरमाया: “तुम सब मुझ से इस बात पर बैअत करो कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक ना ठहराओगे, चोरी नहीं करोगे, जिना नहीं करोगे, अपनी औलाद को कल्ल नहीं करोगे, अपने हाथ और पांव के सामने (जाने-अनजाने) किसी पर इल्जाम नहीं लगाओगे और अच्छे काम करोगे, नाफरमानी नहीं करोगे, फिर जो कोई तुममें से यह वादा पूरा करेगा, उसका सवाब अल्लाह के जिम्मे है और जो कोई इन गुनाहों में से कुछ कर बैठे और उसे दुनिया में उसकी सजा मिल जाये तो उसका गुनाह उतर जायेगा और जो कोई इन गुनाहों में से किसी को कर बैठे, फिर अल्लाह ने दुनिया में उसके गुनाह को छुपाया तो वह अल्लाह के हवाले है, अगर चाहे तो (कयामत के दिन) उसे माफ करे या सजा दे।” हमने इन सब शर्तों पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बैअत कर ली।

फायदे : इस हदीस से यह भी मालूम हुआ कि हुदूद (सजायें) गुनाहों का कफारा है यानी हद्दे शरई कायम होने से गुनाह माफ हो जाता हैं। मालूम हुआ कि दीने इस्लाम में बैअत (वादा) लेना एक मसनून अमल है। रसूलुल्लाह ‘सल्लललाहु अलैहि वसल्लम लोगों से दीने इस्लाम पर कारबन्द रहने, हिजरत करने, मैदाने जिहाद में साबित कदम रहने, बुरी चीजों को छोड़ने, सुन्नत पर अमल करने और बिदअत और खुराफात से दूर रहने की बैअत लेते थे। अलबत्ता बैअते तसव्वुफ (सुफियत की बैअत) की कोई असल नहीं। यह बहुत बाद की पैदावार है।

*19- अबू सईद खुदरी रजि से रिवायत है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “वह जमाना करीब है,जब मुसलमान का बेहतरीन माल बकरियाँ होंगी, जिनको लेकर वह पहाड़ो की चोटियों और बारिश के मकामात की तरफ निकल जायेगा और फितनों से राहे फरार इखि्तियार करके अपने दीन को बचा लेगा।”
फायदे : फितना से मुराद हर वह चीज है, जिससे इन्सान गुमराह होकर अल्लाह के जिक्र और उसकी इबादत से गाफिल हो जाये। हमारे इस दौर में ऐसे फितनों का हुजूम है जो गुमराही और दीन से बेजारी का सबब बनते हैं। ऐसे हालात में तन्हाई इखि्तियार करना जाइज है, हाँ अगर इन्सान में ऐसे दज्जाली फितनों का मुकाबला करने की इल्‍मी, अमली और अख्लाकी हिम्मत है तो मुआशरा में रहते हुये उनकी रोकथाम में लगे रहना अफजल है।

*20- आइशा रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब सहाबा-ए- किराम रजि. को हुक्म देते तो उन्हीं कामों का हुक्म देते, जिनको वह आसानी से कर सकते थे। उन्होंने मालूम किया, ऐ अल्लाह के रसूल! हमारा हाल आप जैसा पर्दा नहीं है। अल्लाह ने तो आपकी अगली पिछली हर कोताही से दरगुजर फरमाया है, यह सुनकर आप इस कद्र नाराज हुये कि आपके चेहरा मुबारक पर गुस्से का असर जाहिर हुआ, फिर आपने फरमाया: “मैं तुम सब से असर जाहिर हुआ, फिर आपने फरमाया: “मैं तुम सब से ज्यादा परहेजगार और अल्लाह को जानने वाला हूँ।’

फायदे : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसलिए नाराज हुये कि सहाबा-ए-किराम रजि, ने “आसान कामों” को बुलन्द मर्तवे और गुनाहों की बख्शिश के लिए नाकाफी ख्याल किया। उनके
गुमान के मुताबिक बुलन्द दर्जे हासिल करने के लिए ऐसे कठिन अमल होने चाहिए, जिनकी अदायगी में तकलीफ उठानी पड़े। इस पर आपने खबरदार किया कि दीन में दखल अन्दाजी की जरूरत नहीं, बल्कि जो और जैसा हुक्म हो, उसी को काफी समझा जाये।

बुखारी हदीस हिंदी EPISODE -1

“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही निहायत रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है ”

*1 :- उमर बिन खताब रजि. से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल محمدﷺ फरमाते है कि , “सवाब के तमाम काम नियतो पर टिके है और हर व्यक्ति को उसकी नीयत के मुताबिक इनाम मिलेगा। इसलिए जो कोई दुनिया कमाने या किसी औरत के साथ शादी करने के लिए वतन छोड़ता है, तो उसकी हिज़रत उसी काम के लिए है जिसके लिए उसने हिज़रत की होगी ।

मायने :- वाजेह रहे कि हर अच्छे काम के लिए आपकी नियत भी अच्छी होनी चाइये वरना न सिर्फ सवाब से महरूमी होगी बल्कि अल्लाह के यहा सख्त सजा का डर भी है ओर जो अमाल खालिस दिल से मुताल्लिक है मसलन डर व उम्मीद वगैरा, इनमे नियत की कोई जरूरत नही । नीज़ नबी محمدﷺ की तरफ नुजुले वहय का सबब आपका इख्लास ए नियत है ।

Note:- “वहय” जो आगे कई बार आएगा उसका मतलब है की खुदा की तरफ से आने वाले हुकुम ।

*2 :- माँ आएशा रज़ि. से रिवायत है कि अल-हरिथ बिन हिशम ने अल्लाह के रसूल से पूछा “ऐ अल्लाह के रसूल ! आपको वहय कैसे आती है ?” अल्लाह के रसूल ने फरमाया , “कभी-कभी यह घंटी बजने की तरह होता है, वहय की यह सूरत मुझ पर बहुत भारी पड़ती है और फिर जब फरिश्ते का पैगाम मुझे याद हो जाता है तो यह बंद हो जाती है ओर कभी-कभी फरिश्ता इंसान की शक्ल में भी आता है और मुझसे बात करता है और जो कुछ वो मुझसे कहता है मै उसे याद कर लेता हूं। ”
आयेशा रजि. का बयान है कि मैंने पैगंबर को बहुत ही सख्त ठंडे दिनो में भी जब वहय आती थी ओर जब वह बंद होती तो उनकी पेशानी से पसीना गिर रहा होता हैं ।

*3 :- आएशा रज़ि. से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल को वहय की शुरुआत सच्चे ख्वाबो की शक्ल में हुई आप जो कुछ ख्वाब देखते वो दिन की रोशनी की तरह सच साबित होते और फिर आप को तन्हाई पसंद हो गयी । हिरा नाम की गुफा में आप तन्हाई इख्तियार करते और कई दिन आप घर तशरीफ़ लाये बगैर आप इबादत में लगे रहते । आप अपने साथ खाने पीने का सामान लेते ओर कुछ रोज़ वहा गुजारते और फिर वापस खदीजा रज़ि. के पास लौटते ओर फिर इतने ही दिनों का सामान लेकर वापस चले जाते । एक दिन गुफा में अचानक एक फरिश्ता आया और उसने आपको पढ़ने के लिए कहा। पैगंबर ने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ना है।
पैगंबर ने कहा,” फरिश्ते ने मुझे कसके पकड़ा और यहा तक कि मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गया और फिर उसने मुझे छोड़ दिया फिर मुझे पढ़ने के लिए कहा और मैंने जवाब दिया, ‘मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ा जाए।’ उसके बाद उसने मुझे फिर से पकड़ लिया और मुझे दूसरी बार दबा दिया जब तक कि मैं इसे और सहन नहीं कर सका। फिर उसने मुझे छोड़ दिया और फिर मुझे पढ़ने के लिए कहा लेकिन फिर मैंने जवाब दिया, ‘मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ा जाए (या मैं क्या पढ़ूं)? उसके बाद उसने मुझे तीसरे बार पकड़ा और मुझे दबा दिया, और फिर मुझे छोड़ दिया और कहा, ‘पढ़ो अपने रब के नाम से, जिसने तुम्हे बनाया है ओर तुम्हारा रब तो निहायत करीम है अल्लाह के रसूल उन आयतो को लेकर वापस लौटे और उनका दिल जोर से धड़क रहा था। फिर आप खदीजा रज़ि. के पास आये और फरमाया कि,” मुझे चादर ओढ़ायो ! मुझे चादर ओढ़ायो !
उन्होंने आपको चादर ओढा दी जब तक आपका डर खत्म नहीं हुआ और उसके बाद आपने उन्हें जो कुछ भी हुआ था बताया और कहा,” मुझे डर है कि मेरे साथ कुछ हो सकता है। “खदीजा रज़ि ने जवाब दिया,” कभी नहीं! अल्लाह आपको कभी जलील नहीं करेगे। आप अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छे रिश्ते रखते हैं, गरीबों और मोहताजों की मदद करते हैं, अपने मेहमानों की खातिरदारी करते हैं और हक़ के सिलसिले में पेश आने वाली तकलीफो में मदद करते है । “खदीजा रज़ि उन्हें साथ लेकर अपने चचेरे भाई वाराका बिन नौफल बिन असद बिन ‘अब्दुल’ उज्जा के पास आई , जो जहालत के समय मे एक ईसाई बन गए थे और इबरानी जुबान भी लिखना जानते थे।
चुनाँचे वह इबरानी जुबान में जितना अल्लाह चाहते थे उतना लिखते थे । वह बूढ़े ओर अंधे हो चुके थे। खदीजा रज़ि ने वाराका से कहा , “भाई, आप अपने भतीजे की बात सुनो!” वाराका ने पूछा, “मेरे भतीजे! आपने क्या देखा है? “अल्लाह के रसूल ने जो कुछ भी देखा था वो सब बयान किया। वाराका ने कहा,” यह वही फरिश्ता है जिसे अल्लाह ने मूसा को भेजा था। काश मैं आपके नबी होने के जमाने मे ताकतवर होता और काश में उस वक़्त तक जिंदा रहू जब तक आपकी कोम आपको निकाल न दे ।
अल्लाह के रसूल ने पूछा,” क्या वे मुझे बाहर निकाल देंगे? “वाराका ने जवाब दिया और कहा,” कोई भी (आदमी) जो इस तरह का पैगाम लाया जैसा आप लाये उसके साथ दुश्मनी की गई ओर अगर मुझे आपका जमाना नसीब हुआ तो में जरूर आपकी मदद करूँगा उसके बाद वाराका की मौत हो गई और वहय भी थोड़ी देर तक रुक गई।

*4 :- जाबीर बिन अब्दुल्ला अल अंसारी रज़ि से रिवायत है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल की जुबानी वहय रुक जाने के बारे में सुना। आपने बयान फरमाया की जब मैं एक रास्ते से गुजर रहा था, अचानक मैंने आसमान से आवाज सुनी और उसी फरिश्ते को जो हीरा गुफा में आया था आसमान ओर जमीन के बीच कुर्सी पर बैठा है मैं उसे देख कर डर गया और घर वापस आया और कहा, ‘मुझे चादर ओढ़े दो । और फिर अल्लाह ने कुरान को नाजिल किया ओर कहा : ऐ चादर में लिपटे हुए मोहम्मद ! उठो और खबरदार करो और अपने रब की बड़ाई का ऐलान करो अपने कपड़े साफ रखो ओर गंदगी से दूर रहो । इसके बाद वहय लगातार तेज़ी से आना शुरू हों गयीं। ”

*5 :- अल्लाह के फरमान को समझाते हुए इब्न अब्बास बयान करते है कि अल्लाह के रसूल वहय को जल्दी से याद करने के लिए अपनी जीभ को हरक़त न दे । कुरआन के उतरते वक़्त उसे याद करने के लिए रसूल अपनी होंठो को हिलाते थे जिससे तकलीफ होतीं थी इस पर अल्लाह ताला ने फरमाया की के नबी इस वाहय को याद करने के लिए जल्दी जल्दी अपने जुबान को हरकत न दो । इसको तुम्हारे दिल मे जमा करना ओर पढ़ा देना हमारी जिमेदारी है ओर फरमाया की कान लगाकर ध्यान से सुने ओर फिर इसका मतलब समझाना भी हमारी जिमेदारी है ।
इन आयात के उतरने के बाद जब जिब्राइल(फ़रिश्ता) आते ओर कुरान सुनाते तो अल्लाह के रसूल खामोशी से सुनते ओर उनके जाने के बाद उसी तरह पढ़ते जिस तरह जिब्राइल ने पढ़ा था ।

*6 :- इब्ने अब्बास रज़ि से रिवायत है कि
अल्लाह के रसूल सभी लोगों से ज्यादा सखी थे,खासकर रमदान में जब जिब्राइल से मुलाकात होती तो आप बहुत खर्च करते ओर जिब्राइल रमदान की हर रात में आपसे मिलते ओर क़ुरआन मजीद का दौर फरमाते ।बेशक अल्लाह के रसूल सदक़ा करने में आंधी से भी ज्यादा तेज रफ्तार होते ।

*7 :- इबने अब्बास रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि अबू सुफियान बिन हर्ब रजि. ने इनसे बयान किया कि रोम के बादशाह हिरक्ल ने अबू सुफियान को कुरैश की एक जमाअत समेत बुलवाया। यह जमाअत सुलह हुदैबिया के तहत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और कुफ्फारेकुरैश के बीच तय शुदा वादे की मुद्दत में मुल्के शाम तिजारत की जरूरत के लिए गई हुई थी। यह लोग ईलिया (बैतुल मुकदस) में उसके पास हाजिर हो गये। हिरक्ल ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। उस वक्‍त उसके इर्द-गिर्द रोम के सरदार बैठे हुये थे।

फिर उसने उनको और अपने तर्जुमान (मतलब
बताने वाले) को बुलाकर कहा कि वह आदमी जो अपने आपको नबी समझता है, तुममें से कौन उसका करीबी रिश्तेदार हैं? अबू सुफियान ने कहा, मैं उसका सबसे ज्यादा करीबी रिश्तेदार हूँ, तब हिरक्ल ने कहा, इसे मेरे करीब कर दो और इसके साथियों को भी करीब करके इसके पास बिठाओ। उसके बाद हिरक्ल ने अपने तर्जुमान से कहा : इनसे कहो कि मैं इस आदमी से उस आदमी (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मुताल्लिक रुवालात करूंगा, अगर यह गलत बयानी करें तो तुम लोग इसको झुटला देना

अबू सुफियान रजि. कहते हैं कि अल्लाह की कसम! अगर झूट बोलने की बदनामी का डर नहीं होता तो मैं मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के बारे में जरूर झूट बोलता। अबू सुफियान रजि. कहते हैं कि इसके बाद पहला सवाल जो हिंरक्ल ने मुझ से आपके बारे में किया, वह यह था कि तुम लोगों में उसका खानदान कैसा है? मैंने कहा, वह ऊँचे खानदान वाला है। फिर कहने लगा, अच्छा! तो क्या यह बात उससे पहले भी तुममें से किसी ने कही थी? मैंने कहा,नहीं, कहने लगा, अच्छा उसके
खानदान में से कोई बादशाह गुजरा है? मैंने कहा, नहीं। कहने लगा : अच्छा! यह बताओ कि बड़े लोगों ने उसकी पैरवी की है, या गरीबों ने?

मैंने कहा कमजोरों ने, कहने लगा: उसके मानने वाले (दिन-ब-दिन) बढ़ रहे हैं या कम हो रहे हैं? मैंने कहा, उनकी तादाद में बढ़ोतरी हो रही है। कहने लगा, उसके दीन में दाखिल होने के बाद कोई आदमी उसके दीन को नापसन्द करते हुए उसके दीन से फिर जाता हैं? मैंने कहा, नहीं! कहने लगा: उसने जो बात कही है, क्या उस (दावा-ए-नबूवत) से पहले तुम लोग उसको झूटा कहा करते थे? मैंने कहा : नहीं, कहने लगा: कया वह धोका देता है? मैंने कहा, नहीं! अलबत्ता हम लोग इस वक्‍त उसके साथ सुलह (राजीनामे) की एक मुद्दत गुजार रहे है, मालूम नहीं इसमें वह क्या करेगा? अबू सुफियान कहते हैं कि इस जुमले के सिवा मुझे और कहीं (अपनी तरफ से ) बात दाखिल करने का मौका नहीं मिला।

कहने लगा : क्या तुम लोगों ने उससे जंग लड़ी है? मैंने कहा : जी हाँ! उसने कहा, फिर तुम्हारी और उसकी जंग कैसी रही? मैंने कहा, जंग में हम दोनों के बीच बराबर की चोट है, कभी वह हमें नुकसान पहुंचा लेता है और कभीहम उसे नुकसान से दो-चार कर देते हैं। कहने लगा: वह तुम्हें किन बातों का हुक्म देता हैं? मैंने कहा, वह कहता हैं सिर्फ अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को शरीक न करो, जिनकी तुम्हारे बाप दादा इबादत करते थे, उनको छोड़ दो और वह हमें नमाज,सच्चाई, परहेजगारी, पाकदामनी और करीबी लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म देता है।

उसके बाद हिरक्ल ने अपने तर्जुमान से कहा, तुम उस आदमी (अबू सुफियान) से कहो कि मैंने तुमसे उस आदमी (नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) का खानदान पूछा तो तुमने बताया कि वह ऊंचे खानदान का है और रिवाज यही है कि पैगम्बर (हमेशा)अपनी कौम के ऊंचे खानदान में से भेजे जाते हैं और मैंने पूछा कि क्या यह बात उससे पहले भी तुम में से किसी ने कहीं थी? तुमने बतलाया कि नहीं, मैं कहता हूँ कि अगर यह बात उससे पहले किसी और ने कही होती तो मैं कहता कि वह आदमी एक ऐसी बात की नकल कर रहा है जो उससे पहले कही जा चुकी है और मैंने पूछा कि उसके बुजुर्गों में से कोई बादशाह गुजरा है?

तुमने बतलाया कि नहीं, मैं कहता हूँ कि अगर उसके बुजुर्गों में कोई बादशाह गुजरा होता तो मैं कहता कि वह आदमी अपने बाप की बादशाहतें का चाहने वाला है और मैंने यह पूछा कि जो बात उसने कही है, इस (दावा-ए-नबुव्वत) से पहले तुमने कभी उस पर झूट बोलने का इल्जाम लगाया था। तो तुमने बतलाया कि नहीं और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि ऐसा नहीं हो सकता कि वह आदमी लोगों पर तो झूट बांधने से बचे और अल्लाह पर झूट बोले। मैंने यह भी पूछा कि बड़े लोग उसकी
पैरवी कर रहे हैं या कमजोर? तो तुमने बतलाया कि कमजोर लोगों ने उसकी पैरवी की है और हकीकत यह है कि इस किरम के लोग ही पैगम्बरों के मानने वालेहोते हैं। मैंने पूछा कि वह बढ़ रहे हैं या कम हो रहे हैं?

तुमने बतलाया कि उनकी तादाद लगातार बढ़ रही है और दर हकीकत ईमान का यही हाल होता है, यहां तक कि वह पूरा हो जाता है। फिर मैंने पूछा कि क्या इस दीन में दाखिल होने के बाद कोई आदमी नफरत करते हुए उसके दीन से फिर जाता हैं? तो तुमने बतलाया कि नहीं और ईमान का यही हाल होता, है कि उसकी मिठास जब दिल में समा जाती है तो फिर निकलती नहीं और मैंने पूछा कि क्या वह वादा खिलाफी भी करता हैं? तो तुमने बतलाया कि नहीं और रसूल ऐसे ही होते हैं, वह धोका नहीं करते। मैंने यह भी पूछा कि वह तुम्हें किन बातों का हुक्म देता है,

तो तुमने बतलाया कि वह अल्लाह की इबादत करने और उसके साथ किसी को शरीक ना ठहराने का हुक्म देता है, तुम्हें बुतपरस्ती से मना करता है और तुम्हें नमाज, सच्चाई और परहेजगारी व पाकदामनी इखितियार करने के लिए कहता है, तो जो कुछ तुमने बतलाया है, अगर वह सही हैं तो वह आदमी बहुत जल्द इस ‘जगह का मालिक हो जायेगा, जहां मेरे यह दोनों कदम हैं। मैं जानता था कि यह नबी आने वाला है, लेकिन मेरा यह ख्याल न था कि वह तुम में से होगा। अगर मुझे यकीन होता कि मैं उसके पास पहुंच सकूंगा तो उससे जरूर मुलाकात करता, अगर मैं उसके पास (मदीना में) होता तो जरूर उसके पांव धोता ।

उसके बाद हिरक्ल ने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का वह खत मंगवाया जो आपने दहिया कलबी रजि, के जरीये हाकिमे बुसरा के पास भेजा था और उसने वह खत हिरक्ल को पहुंचा दिया था, हिरक्ल ने इसे पढ़ा, इसमें यह लिखा था, शुरू अल्लाह के नाम से जो बड़ा महरबान निहायत रहम करने वाला है। अल्लाह क॑ बन्दे और उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ से हिरक्ल अजीमे रोम के नाम। उस आदमी पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे, इसके बाद मैं तुझे कलमा-ए-इस्लाम “ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मर्दुरसूलुल्लाह’” की दावत देता हूँ।

मुसलमान हो जा तू महफूज रहेगा, अल्लाह ‘तआला तुझे दोहरा सवाब देगा, फिर अगर तू यह बात न माने तो तेरी रिआया (जनता) का गुनाह भी तुझी पर होगा। अहले किताब! एक ऐसी बात की तरफ आ जाओ जो हमारे और तुम्हारे वीच बरावर है। हम अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत ना करें और उसके साथ किसी को शरीक ना करें और
हममें से कोई अल्लाह के अलावा एक दूसरे को अपनी बिगड़ी बनाने वालों न समझे। पस अगर यह लोग फिर जायें तो साफ कह दों कि गवाह रहो, हम तो फरमां बरदार हैं”अबू सुफियान रजि. ने कहा, जब हिरक्ल जो कहना चाहता था कह चुका और खत पढ़कर फारिग हुआ तो वहां आवाजें बुलन्द हुई और बहुत शोर मचा और हम बाहर निकाल दिये गये।

मैंने बाहर आकर अपने साथियों से कहा: अबू कबशा के बेटे (मुहम्मद स.अ.व.) का मामला बड़ा जोर पकड़ गया, इससे तो रोमियों का बादशाह भी डरता है, उस रोज के बाद मुझे बरावर यकीन रहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दीन जरूर गालिब होगा, यहां तक कि अल्लाह तआला ने मेरे अन्दर इस्लाम पैदा कर दिया।
इबने नातूर जो बैतुल मुकदस के गवर्नर हिरक्ल का कारसाज और शाम के ईसाइयों का पादरी था, बयान करता है कि हिरक्ल जब बैतुलमुकदइस आया तो एक रोज सुबह के वक्‍त गमी के साथ उठा और उसके कुछ साथी कहने लगे, हम देखते हैं कि आपकी हालत कुछ बुझी-बुझी है। इबने नातूर ने कहा कि हिरक्ल माहिरेनुजूमी और सितारों को पहचानने वाला था ।

जब लोगों ने उससे पूछा तो कहने लगा कि मैंने आज रात तारों पर एक निगाह डाली तो देखता हूँ कि खतना (मुसलमानी) करने बालों का बादशाह जाहिर हो चुका है (बताओ) इन दिनों कौन लोग खतना करते हैं? साथी कहने लगे, यहूदियों के सिवा कोई खतना नहीं करता। उनसे फिक्र मन्द होने की कोई जरूरत नहीं आप अपने इलाके बालों को परवाना (खबर) भेज दें कि तमाम यहूदियों को मार डालो। इस गुफ्तगू के दौरान ही हिरक्ल के सामने एक आदमी ‘पेश किया गया, जिसे गस्सान के बादशाह ने भेजा था और वह रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हाल बयान करता था, जब हिरक्ल ने इससे तमाम मालूमात हासिल कर ली तो कहने लगा कि इसे ले जाओ और देखो कि इसका खतना हुआ है या नहीं? लोगों ने इसे देखा और हिरक्ल को बताया कि इसका खतना हुआ है।

हिरक्ल ने उससे पूछा कि अरब खतना करते हैं। उसने कहा, हाँ! वह खतना करते हैं? तब हिरक्ल ने कहा, यही आदमी (पैगम्बर) इस उम्मत का बादशाह है, जिसका जहूर हो चुका है। फिर हिरक्ल ने अपने इल्म में हमपल्ला एक दोस्त को रूमियों में खत लिखा और खुद हिम्स रवाना हो गया, अभी हिम्स नहीं पहुंचा था कि उसे अपने दोस्त का जवाब मिल गया, उसकी राय भी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जाहिर होने में
हिरक्ल की तरह थी कि आप नबी बरहक हैं, आखिर मुल्के हिम्स पहुंचकर उसने रूम के सरदारों को अपने महल आने की दावत दी। (जब वह आ गये) तो उसने हुक्म देकर दरवाजा बन्द करवा दिया, फिर बालकनी से उन्हें देखा और कहने लगा रूम के लोगों!

अगर तुम अपनी कामयाबी भलाई और बादशाहत पर कायम रहना चाहते हो तो उस पैगम्बर की बैयत कर लो, यह (ऐलाने हक) सुनते ही वह लोग जंगली गधों की तरह दरवाजों की तरफ दौड़े, देखा तो वह बंद थे। अब जब हिरक्ल ने इनकी नफरत को देखा और इनके ईमान लाने से मायूस हुआ तो कहने लगा, इन सरदाओ को मेरे पास लाओ। (जब वह आये) तो कहने लगा कि मैंने अभी जो बात तुमसे कही थी, वह सिर्फ आजमाने के लिए थी, कि देखूं तुम अपने दीन पर किस कदर मजबूत हो? अब मैं वह देख चुका, फिर तमाम हाजरीन ने उसे सज्दा किया और उससे राजी हो गये। यह हिरक्ल (के ईमान लाने) के मुत्ताल्लिक आखरी मालूमात हैं।

ईमान के लिए तीन चीजों का होना जरूरी है।
1. दिल से सच्चा होना
2. जुबान से इकरार
3. जिस्म के आजाओं (अंगों) से पैरवी और अमल का पाबन्द होना।
यहूद को आपकी पहचान व तसदीक थी। नीज हिरक्ल और अबू तालिब ने तो इकरार भी किया था, लेकिन इसके बावुजूद मोमिन नहीं हैं। दिल से सच्चा जानना और जुबान से इकरार की पैरवी और अमल के बगैर कोई हैसियत नहीं। लिहाजा तसदीक में कोताही करने वाला मुनाफिक और इकरार में कोताही करने वाला काफिर जबकि अमली कोताही करने वाला फासिक है। अगर इन्कार की वजह से बद अमली का शिकार है तो उसके कुफ़ में कोई शक नहीं, ऐसे हालात में तसदीक व इकरार का कोई फायदा नहीं ।

*8: अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया : “इस्लाम की बुनियाद पाच चीजों पर रखी’ गई है। गवाही देना कि अल्लाह के अलावा कोई माबूद हकीकी नही और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज कायम करना, जकात अदा करना, हज करना और रमजानुल मुबारक के रोजे रखना।”

*9: अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है,वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बयान करते हैं, आपने फरमाया: ईमान के साठ से कुछ ज्यादा टहनियाँ हैं और शर्म भी ईमान की एक (अहम) टहनी है।”

फायदे : हदीस के आखिर में शर्म को खुसूसियत के साथ बयान किया गया है, क्योंकि इन्सानी अख्लाक में शर्म का बहुत बुलन्द मकाम है, यह वह आदत है जो इन्सान को बहुत से गुनाहों से रोकती है।शर्म सिर्फ लोगों से ही नहीं बल्कि सब से ज्यादा शर्म अल्लाह से होनी चाहिए। इस बिना पर सब से बड़ा बेहया वह बदबख्त इन्सान है जो गुनाह करते वंक्त अल्लाह से नहीं शर्माता, यही वजह है कि ईमान और शर्म के बीच बहुत गहरा रिश्ता है।

*10.अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से. रिवायत है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बयान करते हैं, आपने फरमाया : कि मुसलमान जिसकी जुबान और हाथ से दूसरे मुसलमान महफूज रहे और मुहाजिर वह है जो उन चीजों को छोड़ दे, जिनसे अल्लाह ने मना किया है।

फायदे : इस हदीस में सिर्फ जुबान और हाथ से तकलीफ देने का जिक्र है, क्योंकि ज्यादातर इन्सानी तकलीफों का ताल्लुक इन्हीं दो से होता है, वरना मुसलमान की शान तो यह है कि दूसरे लोगो कोउससे किसी किस्म की तकलीफ न पहुंचे, चूनांचे कुछ रिवायतों में यह ज्यादा भी है कि मोमिन वह है, जिससे दूसरे लोगो के खून महफूज रहें। वाजेह रहे कि इससे मुराद वह तकलीफ देना है जो
बिला वजह हो, क्योंकि बशर्ते कुदरत मुजरिमों को सजा देना और ‘शरपसन्द लोगों के फसाद (लड़ाई-झगड़े) को ताकत के जोर से रोकना तो मुसलमान का असली फर्ज है।