“मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है “
*91 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने मक्का से कत्ल या फील(हाथी) को रोक दिया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और ईमान वालों को इन (काफिरों) पर गालिब कर दिया, खबरदार मक्का मुझ से पहले किसी के लिए हलाल नहीं हुआ और ना मेरे बाद किसी के लिए हलाल होगा, खबरदार! यह मेरे लिए भी दिन में एक घड़ी के लिए हलाल हुआ था। खबरदार! यह इस वक्त भी हराम है। यहां के काटे न काटे जायें, न यहां के पेड़ काटे जायें। ऐलान करने वाले के सिवा वहां की गिरी हुई चीज कोई ना उठाये और जिस का कोई अजीज मारा जाये, उसको दो में से एक का इख्तयार है। दण्ड कबूल कर ले या बदला ले ले, इतने में एक यमनी आदमी आया और उसने अर्ज किया ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलैहि वसल्लम! यह बातें मुझे लिख दीजिए। आपने फरमाया, अच्छा अबू फुलां को लिख दो। कुरैश के एक आदमी ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मगर इजखिर (खुशबूदार घास) के काटने की इजाजत दे दीजिये, इसलिए कि हम इसे अपने घरों और कब्रों में इस्तेमाल करते हैं। तो आपने हाँ काट सकते हो ।
*92 : इब्ने अब्बास रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बहुत बीमार हो गये तो आपने फरमाया कि लिखने का सामान लाओ ताकि मैं तुम्हारे लिए एक तहरीर लिख दूं। जिसके बाद तुम गुमराह नहीं होगे। उमर रजि. ने कहा कि नबी.” “की सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर बीमारी का गल्वा है और हमारे पास अल्लाह की किताब मौजूद है, वह हमें काफी है, लोगों ने इख्तिलाफ शुरू कर दिया और शौर मच गया, तब आपने फरमाया: मेरे पास से उठ जाओ, मेरे यहां लड़ाई झगड़े का कया काम है?
फायदे : हजरत उमर रजि. का मकसद आपके हुक्म की खिलाफवर्जी करना मकसूद न था, बल्कि आपने ऐसा मुहब्बत की खातिर फरमाया, वरना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसके बाद चार रोज तक जिन्दा रहे और दूसरे अहकाम नाफिज फरमाते रहे, जबकि तहरीर के बारे में आपने खामोशी इख्तियार फरमायी। मालूम हुआ कि हजरत उमर रजि. की राय से आपको इत्तिफाक था याद रहे कि लिखने का सामान लाने का यह हुक्म आपने हजरत अली रजि. को दिया था।
*93 : उम्मे सलमा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक रात जागे तो फरमाया: सुब्हान अल्लाह! आज रात कितने फितने नाजिल किये गये, और कितने खजाने खोले गये। इन कमरों में सोने वालियों को जगावो क्योंकि दुनिया में बहुत सी कपड़े पहनने वालियां ऐसी हैं जो आखिरत में नंगी होंगी।
*94 : अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी आखरी उम्र में हमें इशा की नमाज पढ़ाई, जब सलाम के बाद खड़े हो गये तो फरमाया तुम इस रात की अहमियत को जानते हो, आज की रात से सौ बरस बाद कोई आदमी जो अब जमीन पर मौजूद है जिन्दा नहीं रहेगा।
फायदे : इस हदीस से यह भी मालूम होता है कि हजरत खिज़्र अलैहि अब जिन्दा नहीं हैं, क्योंकि इस हदीस के मुताबिक सौ साल बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखने वाला कोई भी जिन्दा नहीं रहा, लेकिन नवाब सिद्दीक हसन रह. को इस से इतेफाक नही ।
*95 : अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैंने एक रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी मैमूना बिन्ते हारिस रजि. के यहां गुजारी। इस रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी इन्हीं के पास थे। आपने इशा मस्जिद में अदा की, फिर अपने घर तशरीफ लाये और चार रकअर्तें पढ़ कर सो गये, फिर जागे और ‘फरमाया, क्या बच्चा सो गया है? या कुछ ऐसा ही फरमाया और फिर नमाज पढ़ने लगे, मैं भी आपके बायीं तरफ खड़ा हो गया, आपने मुझे अपनी दायीं तरफ कर लिया और पांच रकाअतें पढ़ी, उसके बाद दो रकाअत (सुन्नते फजर) अदा कीं, फिर सो गये, यहां तक कि मैंने आपके खर्राटे भरने की आवाज सुनी, फिर (सुबह की) नमाज के लिए बाहर तशरीफ ले गये।
फायदे : यह आपकी खासियत थी कि सोने से आपका यजू नहीं टूटता था, क्योंकि हदीस में है कि रसूलुल्लाह की आंखें सोती हैं, दिल नहीं सोता।
*96 : अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है,उन्होंने फरमाया, लोग कहते हैं अबू हुरैरा रजि. ने बहुत हदीसें बयान की हैं, हालांकि अगर किताबुल्लाह में दो आयतें न होतीं तो मैं भी हदीस बयान न करता,फिर उन्होंने उन आयतों की तिलावत की। “जो लोग छुपाते हैं, उन खुली हुई निशानियों और हिदायत की बातों को जो हमने नाजिल कीं । अर्रहीम’ तक बेशक हमारे मुहाजिर भाई बाजार में बेचने व खरीदने में मशगूल रहते थे और हमारे अन्सारी भाई माल और खेती-बाड़ी के काम में लगे रहते थे, लेकिन अबू हुरैरा रजि. तो अपना पेट भरने के लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास मौजूद रहता था और ऐसे मौके पर हाजिर रहता, जहां लोग हाजिर न रहते और वह बातें याद कर लेता जो दूसरे लोग नहीं याद कर सकते थे। अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है कि उन्होंने फरमाया, मैंने अर्ज किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मैं आपसे बहुत सी हदीसें सुनता हूँ, लेकिन भूल जाता हूँ। आपने फरमाया: अपनी चादर बिछाओ। चूनौंचे मैंने चादर विछाई तो आपने अपने दोनों हाथों से चुल्लू सा बनाया और चादर में डाल दिया, फिर फरमाया कि इसे अपने ऊपर लपेट लो। मैंने उसे लपेट लिया, उसके बाद मैं कोई चीज न भूला।
फासदे : यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का मोजजा (करिश्मा) था कि हजरत अबू हुरैरा रजि. से भूल को खत्म कर दिया गया, जो इन्सान को लाजिम है।
*97 : अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया : मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से (इल्म के) दो जरफ याद किये, इनमें से एक तो मैंने जाहिर कर दिया और दूसरे को भी जाहिर कर दूं तो मेरा यह गला काट दिया जाये।
फायदे : दूसरे जरफ का ताल्लुक बुरे हाकिमों से था। चूनांचे कुछ रिवायतों में इस का बयान है।
*98 : जरीर बिन अब्दुल्लाह रजि. से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आखरी हज के मौके पर उन से फरमागा: लोगों को खामोश कराओ, उसके बाद आपने फरमाया, ऐ लोगो! मेरे बाद एक दूसरे की गर्दने मारकर काफिर न बन जाना।
फायदे : इससे मुराद कुफ़े हकीकी नहीं, बल्कि काफिरों का सा काम मुराद है, वरना मुसलमान को कत्ल करने वाला काफिर नहीं होता, हां! अगर इस कत्ल को हलाल समझता है तो ऐसा इन्सान इस्लाम के दायरे से खारिज है।
*99 : उबय्यि-बिन-क-अ-ब रजि. से रिवायत है कि नवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: मूसा अलैहि. एक दिन बनी इस्राईल को समझाने के लिए खड़े हुये तो उनसे पूछा गया कि लोगों में सबसे बड़ा आलिम कौन हैं? उन्होंने कहा: मैं हूँ, अल्लाह ने उन पर नाराजगी जताई, क्योंकि उन्होंने इल्म को अल्लाह के हवाले न किया, फिर अल्लाह ने उन पर वहय भेजी कि मेरे बन्दों में एक बन्दा जहां दो दरिया मिलते हैं, ऐसा है जो तुझ से ज्यादा इल्म रखता है। मूसा अलैहि. ने कहा: ऐ अल्लाह मेरी उनसे कैसे मुलाकात होगी? हुक्म हुआ कि एक मछली को थैले में रखों। जहां वह गुम हो जाये, वहीं उसका ठिकाना है। फिर मूसा अलैहि. रवाना हुये और उनका नौकर यूशा बिन नून भी साथ था उन दोनों ने एक मछली को थैले में रख लिया। जब एक पत्थर के पास पहुंचे तो दोनों अपने सर उस पर रखकर सो गये, इस दौरान मछली थैले से निकल कर दरिया में चली गई, जिससे मूसा अलैहि. और उनके नौकर को अचम्भा हुआ। फिर दोनों बाकी रात और एक दिन चलते रहे, सुबह को मूसा अलैहि. ने अपने नौकर से कहा कि नाश्ता लाओ हम तो इस सफर से थक गये हैं। मूसा अलैहि. जब तक उस जगह से आगे नहीं निकल गये, जिसका उन्हें हुक्म दिया गया था, उस वक्त तक उन्होंने कुछ थकावट महसूस न की। उस वक्त उनके नौकर ने कहा: क्या आपने देखा कि जब हम पत्थर के पास बैठे थे तो मछली (निकल भागी थी और मैं उसका जिक्र करना) भूल गया। मूसा अलेहि ने कहा, हम इसी की तलाश में थे। आखिर वह दोनों खोज लगाते हुये अपने पैरों के निशानों पर वापिस लौटे। जब उस पत्थर के पास पहुंचे तो देखा कि एक आदमी कपड़ा लपेटे हुये या अपने कपड़ों में लिपटा हुआ है। मूसा अलैहिं. ने उसे सलाम किया खिज़्र अलैहिस्सलाम ने कहा कि तेरे मुल्क में सलाम कहां से आया? मूसा अलैहि. ने जवाब दिया कि (मैं यहां का रहने वाला नहीं हूँ बल्कि) मैं मूसा हूँ। खिज़्र अलैहि. ने कहा, क्या बनी इस्राईल के मूसा हो? उन्होंने कहा! हाँ! फिर मूसा अलैहि. ने कहा, क्या मैं इस उम्मीद पर तुम्हारे साथ हो जाऊँ कि जो कुछ हिदायत की तुम्हें तालीम दी गई है, वह मुझे भी सिखा दोगे। खिज़र सफदर अलैहि ने कहा: तुम मेरे साथ रह कर सब्र नहीं कर सकोगे मूसा बात दरअसल यह है कि अल्लाह तआला ने एक (किस्म का) इल्म मुझे दिया है जो तुम्हारे पास नहीं है और आपको एक किस्म का इल्म दिया जो मेरे पास नहीं है। मूसा अलैहि. ने कहा: इन्शा अल्लाह तुम मुझे सब्र करने वाला पाओगे और मैं किसी काम में आपकी नाफरमानी नहीं करूंगा। फिर वह दोनों समन्दर के किनारे चले। उनके पास कोई कश्ती ना थी। इतने में एक कश्ती गुजरी, उन्होंने कश्ती वाले से कहा कि हमें सवार कर लो। खिज़्र अलैहि. पहचान लिये गये। इसलिए कश्ती वाले ने बगैर किराया लिये बिठा लिया, इतने में एक चिड़िया आयी और कश्ती के किनारे बैठ गई, उसने समन्दर में एक दो चोंच मारीं। खिज़र कहने लगे : ऐ मूसा मेरे और तुम्हारे इल्म ने अल्लाह के इल्म से सिफ॑ चिड़िया की चोंच की मिकदार हिस्सा लिया है। फिर खिज़्र अलेहि. ने कश्ती के तख्तों में से एक तख्ता उखाड़ डाला। मूसा अलहि, कहने लगे, इन लोगों ने तो हमें बगैर किराये के सवार किया और आपने यह काम किया कि इनकी कश्ती में छेद कर डाला ताकि कश्ती वालों को डूबा दो? खिज़्र अलैहि. ने फरमाया: क्या मैंने न कहा था कि तुम मेरे साथ रहकर सब्र नहीं कर सकोगे। मूसा अलैहि. ने जवाब दिया: मेरी भूल चूक पर पकड़ करके मेरे कामों में मुझ पर तंगी ना करो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मूसा अलैहि. का पहला एतराज भूल की वजह से था। फिर दोनों (कश्ती से उतरकर) चले। एक लड़का मिला जो दूसरे लड़कों के साथ खेल रहा था। खिज़र अलैहि. ने उसका सर पकड़कर अलग कर दिया। मूसा अलैहि. ने कहा: आपने एक मासूम जान को नाहक कत्ल कर दिया खिज़्र अलैहि. ने कहा: मैंने आपसे नहीं कहा था कि आपसे मेरे साथ सब्र नहीं हो सकेगा। (इबने उऐना कहते हैं कि पहले जवाब के मुकाबिल इसमें ज्यादा ताकीद थी।) फिर दोनों चलते चलते एक गांव के पास पहुंचे। वहां के रहने वालों से उन्होंने खाना मांगा। गांव वालों ने उनकी मेहमानी करने से साफ इनकार कर दिया। इसी दौरान दोनों ने एक दीवार देखी जो गिरने के करीब थी, खिज़र अलैहि. ने उसे अपने हाथ से सहारा देकर सीधा कर दिया मूसा अलैहि. ने कहा, अगर तुम चाहते तो इस पर मजदूरी ले लेते, खिज़र अलैहि, बोले, बस यहां से, हमारे तुम्हारे बीच जुदाई का वक्त आ पहुंचा है रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, अल्लाह तआला मूसा अलैहि. पर रहमफरमाये। हम चाहते थे कि काश मूसा अलैहि. सब्र करते तो उनके मजीद हालात हमसे बयान किये जाते।
फायदे : हजरत खिज़्र अलैहि. हजरत मूसा अलैहि. से अफजल न थे, लेकिन आपका यह कहना कि मैं सब से ज्यादा इल्म रखता हूँ, अल्लाह तआला को पसन्द न आया। उन्हें चाहिए था कि इस बात को अल्लाह के हवाले कर देते। चूनांचे उनका मुकाबला ऐसे इन्सान से कराया गया जो उनसे दर्जे में कहीं कम था, ताकि फिर कभी इस किस्म का दावा ना करें।
*100 : अबू मूसा रजि, से रिवायत है,उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में एक आदमी आया और पूछने लगा ऐ अल्लाह के रसूल | कि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम!अल्लाह की राह में लड़ना किसे कहते हैं? क्योंकि हममें से कोई गुस्सा की वजह से लड़ता है और कोई इज्जत की खातिर जंग करता हैं आपने फरमाया:आदमी इसलिए लड़े कि अल्लाह का बोल-बाला हो तो ऐसी लड़ाई
अल्लाह की राह में है।
फायदे : मतलब यह है कि अगर शागिर्द खड़ा हो और उस्ताद बैठे बैठे उसको जवाब दे दे तो इसमें कोई बुराई नहीं, बशर्ते कि खुद पसन्दी और घमण्ड की बिना पर ऐसा न करें। इसी तरह खड़े खड़े सवाल करना भी ठीक हैं। और यहां सवाल खड़े खड़े किया गया था।